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القراءۃ الراشدۃ 3
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قصص النبیین الجزء الثانی
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قصص النبیین الجزء الثالث
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سراج النحو شرحِ اردو ہدایت النحو
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کفایۃ النحو شرح اردو ہدایۃ النحو
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عنایۃ النحو علی ہدایۃ النحو
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مصباح النحو شرح اردو ہدایۃ النحو
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معارف النحو شرح اردو ہدایۃ النحو
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روایۃ النحو شرح اردو ہدایۃ النحو
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राजा और फ़कीर: एक शिक्षाप्रद घटना

राजा और फ़कीर: एक शिक्षाप्रद घटना

यह उस ज़माने की बात है जब दुनिया में बादशाहतें (राजशाही) क़ायम थीं और कई-कई मील पर फैली हुई रियासतों पर विभिन्न ख़ानदानों की हुकूमत हुआ करती थी। इसी दौर के एक बादशाह पर क़ुदरत मेहरबान हुई और उसके एक अक्लमंद वज़ीर और बहादुर सिपाहसालार की बदौलत उसकी सल्तनत वसीअ (विशाल) होती चली गई। इस बादशाह के पड़ोसी मुल्क पहले ही उसकी फ़ौजी ताक़त से मरुअब (प्रभावित) थे और उसके मुतीअ व ताबे-फ़रमान (आज्ञाकारी) थे। वहाँ इसी बादशाह के नाम का सिक्का चलता था। बादशाह ने उनकी फ़ौजी क़ुव्वत और वसाइल (संसाधनों) को भी अपने मफ़ाद (हित) में इस्तेमाल किया और दूर तक फैले हुए कई मुल्कों पर हमला करके उन्हें भी फ़तह (विजय) कर लिया था। लेकिन इतने बड़े रक़बे (क्षेत्रफल) पर हुकूमत करने के बावजूद उसकी हवस (लालच) कम नहीं हो रही थी। वह अपनी ताक़त के घमंड में भी मुब्तला हो चुका था और यह सोचता था कि दुनिया पर हुक्मरानी उसका हक़ है। हर क़ौम को उसकी बादशाहत क़बूल कर लेनी चाहिए। यह बादशाह क़िस्मत का ऐसा धनी था कि हर साल एक मुल्क फ़तह करता। वह मफ़्तूह (जीते गए) इलाक़ों में अपने नाम का सिक्का जारी करके वहाँ अपनी क़ौम से कोई हाकिम मुक़र्रर (नियुक्त) कर देता और फिर वह वहाँ के लोगों पर अपना क़ानून लागू करके निज़ाम चलाने लगता। लेकिन इन मुसलसल (लगातार) फ़तुहात (विजयों) के बाद उसे अजीब सा इज़तिराब (बेचैनी) और परेशानी रहने लगी थी। यह दरअस्ल वह हिर्स (लालच) थी जिसने उसकी रातों की नींद और दिन का सुकून छीन लिया था। वह रातों को उठकर नई मुहिमों के मसूबे बनाता रहता था। वक़्त तेज़ी से गुज़रता रहा और एक मर्तबा ऐसी ही मुहिम पर बादशाह ने अपनी फ़ौज रवाना की। लेकिन चंद हफ़्तों बाद क़ासिद (संदेशवाहक) ख़बर लेकर आया कि बादशाह की फ़ौज को नाकामी हुई है और दुश्मन उस पर ग़ालिब (हावी) आ गया है। कई साल के दौरान मुसलसल फ़तुहात ने बादशाह का दिमाग़ ख़राब कर दिया था। वह शिकस्त (हार) का लफ़्ज़ गोया फ़रामोश कर (भूल) बैठा था। उसने यह सुना तो ग़ज़बनाक (क्रोधित) हो गया। उसने मज़ीद (और) लश्कर तैयार करके ख़ुद उस मुल्क की जानिब रवाना होने का फ़ैसला किया। बादशाह तेज़ी से सहरा (रेगिस्तान), पहाड़, दरिया पार करता हुआ उस मुल्क की सरहद पर पहुँचा जहाँ उसका भेजा हुआ लश्कर नाकाम हो गया था। जंग शुरू हुई और मुख़ालिफ़ बादशाह की फ़ौज, जिसका साथ उसके पड़ोसी मुल्क भी दे रहे थे, उन्होंने एक मर्तबा फिर हमलावरों को ढेर कर दिया और बादशाह को नामुराद (नाकाम) लौटना पड़ा। यह शिकस्त उससे हज़म नहीं हो रही थी। इस नाकाम फ़ौजी मुहिम से वापसी पर बादशाह बहुत रंजीदा और परेशान था। एक रोज़ वह अपनी बीवी से बातें कर रहा था, जिसने कहा कि वह एक बुज़ुर्ग को जानती है जिसकी दुआ से वह दोबारा मैदाने-जंग में कामयाब हो सकता है। बादशाह ने उस बुज़ुर्ग को दरबार में तलब किया। मगर बुज़ुर्ग ने आने से इंकार कर दिया और कहलवा भेजा कि "जिसे काम है, वह मुझसे मेरी कुटिया में आकर ख़ुद मिले।" क़ासिद ने बादशाह को बुज़ुर्ग की यह बात बताई तो बादशाह बरहम (नाराज़) हो गया। मगर उसकी बीवी ने समझाया कि वह बहुत पहुँचे हुए हैं और ऐसे लोगों का एहतराम (सम्मान) करना चाहिए। एक रोज़ बादशाह अपने चंद मुसाहिबों (दरबारियों) को लेकर फ़क़ीर की कुटिया पर हाज़िर हो गया। सलाम-दुआ के बाद उसने अपना मुद्दआ (उद्देश्य) बयान किया। बुज़ुर्ग ने उसकी बात सुनी और कहा कि "मैं तुझे हुकूमत और क़ौमें फ़तह करने का कोई गुर (तरीक़ा) तो नहीं बता सकता, मगर एक ऐसी बात ज़रूर तुझ तक पहुँचा देना चाहता हूँ जिसमें सरासर तेरी फ़लाह और भलाई है।" बादशाह को ग़ुस्सा तो बहुत आया, मगर उस पर फ़क़ीर की बेनियाज़ी (उदासीनता) और रुअब क़ायम हो चुका था। उसने सवालिया नज़रों से देखा, तो बुज़ुर्ग ने कहा, "अल्लाह का एक बंदा आधी रोटी खा लेता है और आधी दूसरे भूखे शख़्स को दे देता है, मगर एक बादशाह का यह हाल होता है कि अगर दुनिया के बड़े हिस्से पर क़ब्ज़ा कर ले, तब भी उसको बाक़ी दुनिया पर क़ब्ज़ा करने की फ़िक्र सवार रहती है। तुझे चाहिए कि जो मिल गया है उस पर इक्तिफ़ा (संतोष) कर और अगर दिल को हवस से पाक करना है, तो जो कुछ तेरी ज़रूरत से ज़ायद (अधिक) है उसे तक़सीम (वितरित) कर दे।" यह कहकर बुज़ुर्ग ने बादशाह को कुटिया से निकल जाने का इशारा किया और बादशाह महल लौट गया। लेकिन वह जान गया था कि यह बेइत्मीनानी और इज़तिराब उसी वक़्त ख़त्म हो सकता है, जब वह हिर्स (लालच) छोड़ दे और ख़्वाहिशात को तर्क करके (त्यागकर) क़ानिअ (संतोषी) हो जाए।

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