عربی سوم

التوضیح الضروری شرح القدوری جلد ۱
التوضیح الضروری شرح القدوری جلد ۱
التوضیح الضروری شرح القدوری جلد ۲
التوضیح الضروری شرح القدوری جلد ۲
التوضیح الضروری شرح القدوری جلد ۳
التوضیح الضروری شرح القدوری جلد ۳
التوضیح الضروری شرح القدوری جلد ۴
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التوضیح الضروری شرح القدوری جلد ۵
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التوضیح الضروری شرح القدوری جلد ۶
التوضیح الضروری شرح القدوری جلد ۶
القدوری مع احادیثھا و اصولھا جلد ۱
القدوری مع احادیثھا و اصولھا جلد ۱
القدوری مع احادیثھا و اصولھا جلد ۲
القدوری مع احادیثھا و اصولھا جلد ۲
البلاغۃ الواضحۃ و دلیلھا(علم المعانی)
البلاغۃ الواضحۃ و دلیلھا(علم المعانی)

रश्क के क़ाबिल एक वाक़िया

रश्क के क़ाबिल एक वाक़िया

एक तुर्क मुसलमान मस्जिद-ए-नबवी शरीफ़ के अहाते (प्रांगण) में खड़े होकर अपना आँखों देखा वाक़िया इस तरह बयान करता है: मैं मस्जिद-ए-नबवी में खड़ा देख रहा था कि चार पुलिसवाले किसी का इंतज़ार कर रहे हैं। फिर एक शख़्स नमूदार (प्रकट) हुआ तो पुलिसवालों ने भागकर उसे क़ाबू में कर लिया और उसके हाथ जकड़ लिए। नौजवान ने कहा, "मुझे दुआ और तवस्सुल (सिफ़ारिश) की इजाज़त दे दो। मेरी बात सुन लो, मैं कोई भिखारी नहीं हूँ और न ही कोई चोर हूँ।" फिर वह जवान चीखने लगा। मैंने उसे देखा तो ऐसा लगा जैसे मैं उसे जानता हूँ। मैं बताता हूँ कि मैंने उसे कैसे पहचाना; दरअसल, मैंने उसे कितनी ही मर्तबा बारगाह-ए-रिसालत (रोज़ा-ए-रसूल) में रोते हुए देखा था। यह एक अल्बानियाई (Albanian) नौजवान था। उसकी उम्र 35 या 36 साल के दरमियान थी, उसके सुनहरे बाल और हल्की सी दाढ़ी थी। मैंने पुलिसवालों से कहा, "इसका कोई जुर्म नहीं है, तो तुम इसके साथ ऐसा क्यों कर रहे हो? आख़िर क्या इल्ज़ाम है इस पर?" उन्होंने कहा, "तू पीछे हट! इस मामले में बोलने का तुझे कोई हक़ नहीं।" लेकिन मैंने फिर से कहा, "आख़िर इसका तुम्हारे साथ क्या मसला है? क्या इसने कोई चोरी की है?" उन्होंने कहा, "यह बंदा 6 साल से इधर मदीना शरीफ़ में रह रहा है, लेकिन इसका यह क़ियाम (रहना) ग़ैर-क़ानूनी (बिना वीज़ा के) है। हम इसे पकड़कर वापस इसके देश भेजना चाहते हैं, लेकिन वह हर बार एक ही चाल से भाग जाता है और जाकर रौज़ा-ए-रसूल में पनाह ले लेता है। हम इसे अंदर जाकर गिरफ़्तार नहीं करना चाहते थे।" मैंने पूछा, "तो अब इसके साथ क्या करोगे?" कहने लगे, "हम इसे पकड़कर जहाज़ पर बिठाएंगे और वापस अल्बानिया भेज देंगे।" नौजवान मुसलसल (लगातार) रोए जा रहा था और कह रहा था, "क्या हो जाएगा अगर तुम मुझे छोड़ दोगे तो? देखो, मैं कोई चोर नहीं हूँ, मैं किसी से भीख नहीं मांगता। मैं तो यहाँ बस मोहब्बत-ए-रसूल ﷺ में रह रहा हूँ।" पुलिसवालों ने कहा, "नहीं, ऐसा जाइज़ नहीं है।" नौजवान ने कहा, "अच्छा, मुझे ज़रा आराम से रसूलुल्लाह ﷺ से एक अर्ज़ कर लेने दो।" फिर नौजवान ने अपना मुँह गुम्बद-ए-ख़िज़रा की तरफ़ कर लिया। पुलिसवालों ने कहा, "चल कह, जो कहना है।" तो नौजवान ने गुम्बद-ए-ख़िज़रा की तरफ़ देखा और जो कुछ अरबी में कहा, वह मैं समझ गया। वह नौजवान कह रहा था, "या रसूलल्लाह ﷺ! क्या हमारे दरमियान इत्तिफ़ाक़ (समझौता) नहीं हुआ था? क्या मैंने अपने माँ-बाप को नहीं छोड़ा? क्या अपनी दुकान बंद करके अपना घर-बार नहीं छोड़ा? और यह अहद (वादा) करके यहाँ नहीं आया था कि आपके जवार-ए-रहमत (साए) में रहा करूँगा? हुज़ूर! अब देख लीजिए, ये मुझे ऐसा करने से मना कर रहे हैं। या रसूलल्लाह ﷺ! आप मुदाख़लत (हस्तक्षेप) क्यों नहीं फ़रमाते? या रसूलल्लाह ﷺ! आप मुदाख़लत क्यों नहीं फ़रमाते?" इतने में नौजवान बेहाल (बेहोश) होने लगा तो पुलिसवालों ने ज़रा ढील दी और नौजवान नीचे गिर गया। एक पुलिसवाले ने उसे ठोकर मारते हुए कहा, "ओ धोखेबाज़ उठ!" लेकिन नौजवान ने कोई रद्दे-अमल (प्रतिक्रिया) ज़ाहिर नहीं की। मैंने पुलिसवालों से कहा, "यह नहीं भागेगा, तुम हम्मामात (वॉशरुम) से पानी लाओ और इसके चेहरे पर डालो।" लेकिन नौजवान कोई हरकत नहीं कर रहा था। एक पुलिसवाले ने कहा, "इसे देखो तो सही, कहीं यह सचमुच मर ही न गया हो।" दूसरा पुलिसवाला कहने लगा, "इसे हमने कौन सी ऐसी ज़र्ब (चोट) लगाई है, जिससे यह मर जाए।" फिर उन्होंने एम्बुलेंस को बुलाया। उधर सामने वाले सात नंबर गेट से एक एम्बुलेंस ले आए। उन्होंने नौजवान की शह-रग पर हाथ रखकर हरकत नोट की और नब्ज़ चेक की, तो कहने लगे, "इसे तो मरे हुए 15 मिनट गुज़र चुके हैं।" अब पुलिसवाले जैसे मुजरिम हों, नीचे बैठ गए और रोने लगे। वह मंज़र भी देखने वाला था। उनमें से एक तो अपने दोनों घुटनों पर हाथ मारते हुए कहता था, "हाय! हमारे हाथ क्यों न टूट गए। काश हमें मालूम होता कि इसे रसूलल्लाह ﷺ से इतनी शदीद (गहरी) मोहब्बत है। हाय! हमारे हाथ क्यों न टूट गए।" इसके बाद एम्बुलेंस वालों ने उसे वहाँ से उठा लिया, और जन्नतुल बक़ी की तरफ़ तजहीज़-ओ-तकफ़ीन (कफ़न-दफ़न) वाले हिस्से में ले गए। ग़ुस्ल के वक़्त मैं भी वहीं मौजूद था। मैं उन्हें कहता था, "मुझे भी हाथ लगाने दो, मुझे भी इसकी चारपाई को उठाने दो।" जब जनाज़ा तैयार होकर नमाज़ के लिए जाने लगा तो पुलिसवालों ने मुझसे कहा कि, "हमने जितना गुनाह उठाया है, बस उतना काफ़ी है। इसे हमारे सिवा और कोई नहीं उठाएगा। शायद इसी तरह हमें आख़िरत में कुछ रियायत (छूट) मिल जाए।" मेरे सामने ही वह नौजवान बार-बार कह रहा था कि, "या रसूलल्लाह! आप मुदाख़लत क्यों नहीं फ़रमा रहे?" देखा! रसूलुल्लाह ﷺ ने मुदाख़लत फ़रमा दी और मलक-उल-मौत (मौत के फ़रिश्ते) ने अपना फ़रीज़ा (कर्तव्य) अदा करके उसे आप ﷺ तक हमेशा के लिए पहुँचा दिया। अल्लाह हमें अपने हबीब ﷺ की वैसी ही मोहब्बत अता फ़रमाए जैसी इस अल्बानी नौजवान को अता फ़रमाई थी। आमीन।

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