عربی سوم

تھذیب خلاصۃ الدلائل و تنقیح المسائل فی شرح القدوری و معہ حاشیۃ غایۃ المسائل
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تنقیح الحواشی لحل اصول الشاشی
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اوضح التسہیل لشرح ابن عقیل جلد ۱
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اوضح التسہیل لشرح ابن عقیل جلد ۲
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ارشاد الحواشی شرح اردو اصول الشاشی
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تقریب التہذیب شرح شرح تہذیب (مفتی حبیب اللہ صاحب)
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اشرف الادب مترجم و شرح اردو نفحۃ العرب
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غایة التحقیق شرح کافیہ
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تعلیل القران
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कलमा पढ़ी हुई मेम

कलमा पढ़ी हुई मेम

हमारे एक दोस्त थे; ज़ेहन (सोच) इस्लामी, लेकिन चेहरा-मोहरा ग़ैर-इस्लामी। हम सिर्फ़ उनके ज़ेहन पर ही अल्लाह का शुक्र अदा करते थे। मौसूफ़ (महोदय) कुछ समय के लिए इंग्लैंड तशरीफ़ ले गए, और जब उनकी वापसी हुई तो बगल में एक मेम (गोरी मेम) थीं! चूँकि मौसूफ़ का ताल्लुक एक पारंपरिक परिवार से था, इसलिए यह ख़बर जंगल की आग की तरह फैल गई कि जनाब गोरी मेम को ब्याह कर लाए हैं। रिश्तेदारों ने गोरी के दीदार के लिए दूर-दूर से उनके घर तक का सफ़र किया। महिलाएं सिर पर दुपट्टा डाले चोरी-छिपे मेम साहिबा को देखतीं और उन्हें हाथ लगाने से भी डरतीं कि कहीं गोरी मैली न हो जाए। दूल्हे की बहनें बड़े गर्व से अपनी सहेलियों को बताती फिरतीं कि "भैया इंग्लैंड से मेम लाए हैं!" बच्चे तो उस कमरे से निकलते ही नहीं थे जहाँ मेम रुकी हुई थी। अम्मा को इंग्लिश वगैरह तो नहीं आती थी, लेकिन फिर भी परंपरा के मुताबिक़ उन्होंने चादर और सूट गोरी को दिया, और बलाएँ लेते-लेते रुक गईं कि पता नहीं मेम को कैसा लगेगा। हाँ, बेटे को जी भरकर दुआएँ देती रहीं। सिर्फ़ अब्बा जी थे जिन्होंने बेटे मियाँ से दरयाफ़्त (पूछताछ) किया, "मुसलमान किया है?" बेटे ने जवाब दिया, "जी, उसने कलमा पढ़ा हुआ है।" इस पर अब्बा जी मुतमइन (संतुष्ट) हो गए! संयुक्त परिवार (मुश्तरका ख़ानदान) का निज़ाम था। कुछ समय गुज़रा तो एक नया काम शुरू हुआ। मियाँ के ऑफ़िस जाने से पहले मेम दरवाज़े पर ही शौहर की बाहों में झूल जातीं और चेहरे पर प्यार की एक लंबी मुहर लगा देतीं (चूम लेतीं)! घर में कुछ कानाफूसी हुई, तो बेटे ने पूछने पर बताया, "समझ जाएगी, कलमा पढ़ा हुआ है।" गर्मियाँ शुरू हुईं तो गोरी ने पैंट उतारकर निकर (शॉर्ट्स) पहनना शुरू कर दिया। अब्बा जी ने तो कमरे से बाहर निकलना ही छोड़ दिया और भाई रात को देर से घर आने लगे। अम्मा हर वक़्त शर्म के मारे घर की दीवारों को तकती रहतीं। बेटे से शिकायत हुई तो उसने फिर वही बताया, "कलमा पढ़ा हुआ है।" एक शादी के मौक़े पर गोरी ने वेस्टर्न डांस का ऐसा शानदार नमूना पेश किया कि बड़े-बड़ों ने दिल थाम लिया। पूछने पर फिर बताया गया, "कलमा पढ़ा हुआ है।" गोरी ईद वगैरह तो मनाती, लेकिन हर साल क्रिसमस भी बड़े ठाठ-बाठ (तज़ुक-ओ-एहतेशाम) से मनाती। बेटा हर बार पूछने पर जवाब देता, "कलमा पढ़ा हुआ है।" वक़्त गुज़रता गया, परिवार में बर्दाश्त (सहनशीलता) पैदा होती चली गई। बच्चा हुआ तो गोरी ने ख़तना करवाने से साफ़ इनकार कर दिया, कहने लगी कि यह ज़ुल्म है। बेटा खिसियानी हँसी के साथ बोला, "समझ जाएगी, कलमा पढ़ा हुआ है।" डांस, म्यूज़िक, फ़िल्में, कॉकटेल पार्टियाँ, क्रिसमस और सरेआम चूमना-मुस्कुराना घर के कल्चर का हिस्सा बन गए। भाई धीरे-धीरे भाभी से फ़्री (फ्रैंक) होते चले गए, बातों-बातों में हाथों पर हाथ मारते और भाभी से अपने लिए भी गोरी सहेलियाँ ढूँढने की गुज़ारिश करते। बहनें भाभी के कमरे में जातीं और जींस की पैंटें पहन-पहनकर शीशे के आगे ख़ुद को चेक करतीं—आख़िर कलमा तो उन्होंने भी पढ़ा हुआ था! वे भाभी से अपने दिल की हर बात खुलकर बयां करतीं। गोरी कभी-कभार जुमे की नमाज़ पढ़ लेती थी, इसलिए अब्बा जी भी कहने लगे, "कलमा पढ़ा हुआ है।" दोस्त-अहबाब जब भी मिलने जाते, तो गोरी शौहर के पहलू से चिपक कर बैठ जाती, एक-दो बार तो जगह तंग होने की सूरत में गोद में भी बैठने से गुरेज़ नहीं किया। पूछने पर सिर्फ़ इतना जवाब मिलता, "कलमा पढ़ा हुआ है।" गोरी का एक काम अच्छा था; जब भी वह बाहर बाज़ार वगैरह निकलती, तो जींस-शर्ट में होने के बावजूद सिर पर एक दुपट्टा सा डाल लेती। देखने वाले देखकर ही अंदाज़ा लगा लेते कि "कलमा पढ़ा हुआ है"!!!!!! 🔷 "इस्लामी जम्हूरियत" (इस्लामी लोकतंत्र) भी मग़रिब (पश्चिम) की एक ऐसी ही गोरी मेम है, जिसे हमारे कुछ धार्मिक मिज़ाज वाले भाई ब्याह कर लाए हैं। उन्होंने इसे यहाँ के समाजों के क़ाबिल-ए-क़बूल बनाने के लिए कलमा पढ़ाया। क़ौम के लिए उसके रौब में आने के लिए उसका परदेसी (विदेशी) होना ही काफ़ी था—इतनी गोरी, इतनी चिट्ठी... "कलमा पढ़ी हुई जम्हूरियत"!! उन्होंने इस पर उंगली उठाने या इसे हाथ लगाने की भी जुर्रत नहीं की। दूर-दूर से ही देखकर ख़ुश हो गए कि चलो, एक कलमा पढ़ी हुई गोरी अपने यहाँ भी आई है। उसने रिवाज तोड़े, क़ानून और दस्तूर तोड़े, आज़ादी के नाम पर हर बुराई को अंदर ले आई, लेकिन क़ौम इसी बात पर ख़ुश रही कि "कलमा पढ़ा हुआ है"!! समाज के नाम पर यह हर उस मैदान में उसी तरह नाचने लगी जो कि ग़ैर-मुस्लिम क़ौमों का दस्तूर था। लोग फिर भी मुतमइन रहे कि उसने कलमा पढ़ा हुआ है। उसने हर शिर्क और कुफ़्र को एक बहाना (जवाज़) दिया, हर ज़ालिम को इक़्तेदार (सत्ता) तक पहुँचने का रास्ता दिया, दीन के हर बड़े (बुज़ुर्ग) को समझौते करना सिखाया, कलमे का सहारा लेकर हर बुराई को आम किया, और हम पड़ोसियों की तरह इसी बात पर ख़ुश रहे कि उसने कलमा पढ़ा हुआ है!! अगर किसी ने बहुत ज़्यादा शर्मिंदगी महसूस की भी, तो अम्मा जी की तरह सिर झुकाकर यही कहा कि "कलमा पढ़ा हुआ है"। हमारी यह गुमराह (बेराह-रवी) कलमे के भेष में बहुत कुछ बर्बाद कर देगी। ज़्यादा तबाही से बचने के लिए अब भी वक़्त है... अपनी ज़िंदगी में सच्चा इस्लाम लाने की कोशिश कीजिए, वरना हमने भी बस कलमा ही पढ़ा हुआ है (यानी सिर्फ़ नाम के मुसलमान हैं)। _____📝📝📝_____ मनक़ूल (साभार)। चयन: इस्लामिक ट्यूब प्रो ऐप।

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