मुअतसिम बिल्लाह के बाद उनका बेटा वासिक़ बिल्लाह 227 हिजरी में राजसिंहासन (ताज-ओ-तख़्त) का वारिस बना। वह गुमराह करने वाले विचारों और अक़ीदों का मालिक था और मोतज़ली (Mu'tazilite) अक़ीदों, विशेष रूप से 'ख़ल्क़-ए-क़ुरआन' (क़ुरआन के मख़्लूक़ होने) के अक़ीदे के प्रचार-प्रसार में अपने बाप से भी आगे बढ़ गया। उसके दौर में एक अजीब वाक़या (घटना) पेश आया; दरबार का ख़ास मसखरा (विदूषक) एक दिन ख़लीफ़ा के सामने आया और कहने लगा: "अल्लाह तआला अमीरुल मोमिनीन को क़ुरआन के बारे में सब्र-ए-जमील अता फ़रमाए! मैं ताज़ियत (शोक व्यक्त करने) के लिए आया हूँ।" वासिक़ बोला: "तेरा नास हो! नालायक़ क्या कह रहा है, क्या क़ुरआन का देहांत (वफ़ात) हो गया?" मसखरे ने कहा: "अमीरुल मोमिनीन! आख़िर इसके सिवा क्या चारा है, हर मख़्लूक़ (सृष्टि) पर मौत आने ही वाली है और क़ुरआन भी तो आपके ख़्याल में मख़्लूक़ है। आज नहीं तो कल (नौज़ुबिल्लाह) यह हादसा होकर रहेगा।" मसखरे के इस जवाब पर वासिक़ सोच में पड़ गया, तो मसखरे ने दूसरा सवाल कर दिया और बड़ी संजीदगी (गंभीरता) से कहने लगा: "अमीरुल मोमिनीन! आइंदा लोग नमाज़-ए-तरावीह में क्या पढ़ा करेंगे?" इस तंज़िया (व्यंग्यात्मक) सवाल ने वासिक़ बिल्लाह को मसला-ए-ख़ल्क़-ए-क़ुरआन के बारे में गहरी सोच पर मजबूर कर दिया। तब उसने इस मसले में तशद्दुद (सख़्ती और ज़ुल्म) छोड़ दिया। ____📝📝📝____ किताब: हर वाक़या बे-मिसाल जिल्द 1। सफ़्हा नंबर: 203। मुसन्निफ़ (लेखक): अबू तल्हा मोहम्मद इज़हारुल हसन महमूद। चयन: इस्लामिक ट्यूब प्रो ऐप।
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