عربی چھارم

توضیح الوقایہ شرح اردو شرح وقایہ (کتاب النکاح و الرضاعت)
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تسہیل شرح الجامی
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دلیل الفالحین شرح اردو ریاض الصالحین جلد ١
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دلیل الفالحین شرح اردو ریاض الصالحین جلد ٢
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دلیل الفالحین شرح اردو ریاض الصالحین جلد ٣
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دلیل الفالحین شرح اردو ریاض الصالحین جلد ٤
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دلیل الفالحین شرح اردو ریاض الصالحین جلد ٥
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منثورات من ادب العرب
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تسہیل الحقائق شرح اردو کنز الدقائق جلد ١
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युवा पीढ़ी की तरबियत: शरीयत बनाम सामाजिक परंपराएँ

युवा पीढ़ी की तरबियत: शरीयत बनाम सामाजिक परंपराएँ

कितने पुरुष हैं जिन्हें बालिग होते ही "सूरह अल-माएदा" की तफ़सीर पढ़ाई गई और कितनी महिलाएँ हैं जिन्हें बालिग होते ही "सूरह अन-नूर" की तफ़सीर पढ़ाई गई? जानता हूँ, बहुत कम हैं। मगर दूसरी तरफ देखें...! कितने पुरुष हैं जिन्होंने माता-पिता से बालिग होने के बाद सुना कि "तुम्हारी कोई ऐसी-वैसी बात न सुनूँ" और कितनी महिलाएँ हैं जिन्होंने बालिग होने के बाद माता-पिता से सुना कि "हमारी इज़्ज़त की लाज रखना, तुम्हारी कोई ऐसी-वैसी बात न सुनूँ"? जानता हूँ यह तादाद काफ़ी ज़्यादा है। क्योंकि हमारे यहाँ "शरीयत" नहीं सिखाई जाती, माता-पिता और ख़ानदान की "इज़्ज़त" व "हुरमत" बचाने का पाठ पढ़ाया जाता है। यह तक नहीं समझाया जाता कि "तुम क़ीमती हो... अपनी हिफ़ाज़त करना।" मगर बालिग होते ही कड़ी नज़र रखी जाती है। वह वक़्त जब इंसान पर जज़्बाती जुड़ाव (भावनात्मक लगाव) का बहुत गहरा असर होता है, उस वक़्त आज़ाद परिंदे को रस्सियों में जकड़ने की कोशिश की जाती है। और मोहब्बत के तलाशने वाले वे परिंदे, जिनकी रगों में जवान ख़ून दौड़ रहा होता है, वे ज़ोर आज़माइश करते हैं; फिर रस्सी टूट जाती है, और कभी कभार गले का फंदा भी बन जाती है। अगर "हब्लुल्लाह" यानी "अल्लाह की रस्सी" यानी क़ुरआन के हिसार (घेरे) में औलाद को और ख़ुद को रखते तो ऐसा हरगिज़ न होता, क्योंकि वह रस्सी बहुत मज़बूत होती है, जो दिलों को जोड़ती है, रिश्तों को जोड़ती है और सिराते-मुस्तक़ीम (सीधे रास्ते) पर चलाती है। जवान होती औलाद को शरीयत सिखाएं। बेटे को सूरह अल-माएदा जबकि बेटी को सूरह अन-नूर सिखाएं। उन्हें बताएं कि यह वक़्त अगर अल्लाह पाक की ख़ातिर गुज़ारा तो मुस्तक़बिल (भविष्य) बहुत ख़ूबसूरत होगा। उन्हें बताएं कि उनके पास बेहतरीन हलाल विकल्प (ऑप्शन्स) मौजूद हैं और उन्हें अपने जज़्बात हराम रिश्तों में ज़ाया (बर्बाद) करने की ज़रूरत नहीं। उन्हें बताएं कि हम मिलकर तुम्हारे लिए बेहतरीन फ़ैसला करेंगे जो तुम्हारे लिए अच्छा होगा और जिसमें तुम्हारी ख़ुशी होगी। उन्हें बताएं कि हराम, हलाल की लज़्ज़त (आनंद) को ख़त्म कर देता है। हुक़ूक़ और फ़राइज़ (अधिकार और कर्तव्य) महज़ अपनी मर्ज़ी थोपने के बारे में नहीं हैं, और न ही तरबियत (परवरिश) महज़ दो-तीन हुक्म सुना देने का काम है। इस सिस्टम की सबसे बड़ी समस्या यह है कि माता-पिता अपनी इच्छाएं ख़ुद पूरी नहीं करते, उनकी इच्छाएं बच्चों से जुड़ी होती हैं। ("इतने सालों से पाला है, क्या मुझ पर इसका हक़ नहीं कि अपनी मर्ज़ी की बहू लाऊँ या मर्ज़ी का दामाद चुनूँ?") वे अपनी ज़िंदगी का फ़ैसला ख़ुद नहीं करते (उनके माता-पिता ने किया होता है), इसलिए वे बच्चों की ज़िंदगी का फ़ैसला करना चाहते हैं। उन्हें अपने स्टैंडर्ड की बहू चाहिए होती है या पसंद का दामाद... बच्चों की पसंद से फ़र्क़ नहीं पड़ता। यह सिलसिला यूँ ही चलता रहेगा... और किसी की ज़िंदगी की डोर उसके हाथ में नहीं होगी। ये नक़ली रस्सियाँ बनती रहेंगी और टूटती रहेंगी। मगर हम "हब्लुल्लाह" को नहीं थामेंगे, क्योंकि इसे थामने के लिए बहुत सी चीज़ें छोड़नी होंगी। जैसे कि "समाज की दक़ियानूसी और पुरानी रीतियाँ" जो हमारी रूहों को तबाह कर चुकी हैं। या तो अपने समाज को राज़ी कर लो या अल्लाह सुब्हानहू व तआला को...!!!

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