عربی چھارم

خلاصۃ الانوار شرح نور الانوار
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تذکرہ صاحب ہدایہ
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شرح شذور الذھب
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أحسن الوقایہ شرح اردو شرح الوقایہ جلد ۱
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أحسن الوقایہ شرح اردو شرح الوقایہ جلد ۳
أحسن الوقایہ شرح اردو شرح الوقایہ جلد ۳
تسہیل الوقایہ شرح شرح الوقایہ
تسہیل الوقایہ شرح شرح الوقایہ
قوت الاخیار جلد 1,2
قوت الاخیار جلد 1,2
قوت الاخیار جلد ۳,۴
قوت الاخیار جلد ۳,۴
شرح الوقایہ جلد ۲
شرح الوقایہ جلد ۲

अहंकार का बुरा अंत

अहंकार का बुरा अंत

यज़ीद बिन मलिक एक उमय्यद खलीफा थे, वह नए खलीफा थे जो उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ के बाद आए थे। एक दिन वह कहने लगे, "कौन कहता है कि बादशाहों को खुशियाँ नसीब नहीं होतीं...? मैं आज का दिन खुशी के साथ गुज़ार कर दिखाऊँगा, अब मैं देखता हूँ कि कौन मुझे रोकता है...?" उनसे कहा गया, "आजकल बगावत हो रही है, यह हो रहा है, वह हो रहा है, तो मुसीबत खड़ी होगी।" वह कहने लगे, "आज मुझे कोई देश की खबर न सुनाई जाए, चाहे कितनी भी बड़ी बगावत हो जाए, मैं कोई खबर सुनना नहीं चाहता, आज का दिन खुशी के साथ गुज़ारना चाहता हूँ।" उनकी एक बहुत खूबसूरत लौंडी (दासी) थी, जिसके हुस्न और जमाल की कोई मिसाल नहीं थी, जिसका नाम हुबाबा था। वह अपनी बीवियों से भी ज़्यादा उससे प्यार करते थे। उसे लेकर वह महल में दाखिल हो गए। फल आ गए, पेय पदार्थ आ गए, चीजें आ गईं; आज का दिन खुशी से गुज़ारना चाहते हैं। अभी आधा दिन भी नहीं गुज़रा था, हुबाबा को गोद में लिए हुए हैं, उसके साथ हंसी-मज़ाक कर रहे हैं, और अपने हाथ से अंगूर तोड़-तोड़ कर उसे खिला रहे हैं। उन्होंने अंगूर का एक दाना लिया और उसके मुँह में डाल दिया। वह किसी बात पर हंस पड़ी, तो वह अंगूर का दाना सीधा उसकी सांस की नली में जाकरक अटक गया, और एक झटके के साथ उसकी जान निकल गई। जिस दिन को वह सबसे ज़्यादा खुशी के साथ गुज़ारना चाहता था, वह उसकी ज़िंदगी का ऐसा बदतर (सबसे बुरा) दिन बना कि वह दीवाना हो गया, पागल हो गया। तीन दिन तक उसने उसे दफ़्न नहीं करने दिया, यहाँ तक कि उसका जिस्म गल-सड़ गया। ज़बरदस्ती बनू उमय्या के सरदारों ने उसका शव (मय्यत) छीना और दफ़्न किया, और दो हफ्ते के बाद वह इसी दीवानगी में मर गया। तकब्बुर (अहंकार) का अंजाम ऐसा ही होता है। (बिखरे मोती: 5-256, साभार हयातुल् हैवान) _____________📝📝_____________ मनक़ूल (उद्धृत)। चयन: इस्लामिक ट्यूब प्रो ऐप

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