عربی ششم

شرح عقیدہ طحاویہ
شرح عقیدہ طحاویہ
طرازی شرح سراجی
طرازی شرح سراجی
تسہیل بیضاوی شرح تفسیر بیضاوی
تسہیل بیضاوی شرح تفسیر بیضاوی
تنویر العینین بشرح تفسیر الجلالین المجلد الاول
تنویر العینین بشرح تفسیر الجلالین المجلد الاول
تنویر العینین بشرح تفسیر الجلالین المجلد الثانی
تنویر العینین بشرح تفسیر الجلالین المجلد الثانی
تنویر العینین بشرح تفسیر الجلالین المجلد الثالث
تنویر العینین بشرح تفسیر الجلالین المجلد الثالث
تنویر العینین بشرح تفسیر الجلالین المجلد الرابع
تنویر العینین بشرح تفسیر الجلالین المجلد الرابع
عقیدۃ الطحاوی مع الحواشی و الزیادات
عقیدۃ الطحاوی مع الحواشی و الزیادات
شرح عقیدہ طحاویہ
شرح عقیدہ طحاویہ

सच्चे प्रेम की परीक्षा और नबी ﷺ की आज्ञाकारिता

सच्चे प्रेम की परीक्षा और नबी ﷺ की आज्ञाकारिता

मेरे बुख़ारी शरीफ़ के उस्ताद-ए-मोहतरम, साकिन-ए-बक़ी (बक़ी के निवासी), हज़रत अक़दस मौलाना इस्लाम-उल-हक़ साहब रहमतुल्लाह अलैह ने बुख़ारी शरीफ़ के दर्स (व्याख्यान) में एक क़ीमती बात बताई थी कि मोहब्बत का पता टकराव और मुक़ाबले के वक़्त चलता है। मिसाल के तौर पर, आप बज़ाहिर ऐसा महसूस कर रहे हैं कि मुझे अपनी बीवी से जितनी मोहब्बत है उतनी माँ से नहीं है, लेकिन जब दोनों में टकराव की शक्ल पैदा होगी तब असल हक़ीक़त मालूम होगी कि आपको किस से ज़्यादा मोहब्बत है। इसी तरह हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की मोहब्बत का सही पता भी टकराव के वक़्त मालूम होगा; माँ-बाप या बीवी-बच्चों में से कोई हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की गुस्ताख़ी कर बैठे, तो देखो कि दिल की कैफ़ियत (स्थिति) क्या है? अर्ज़ यह कर रहा था कि मेरे हज़रत का इर्शाद है कि अलहम्दुलिल्लाह, हर मोमिन के दिल में अल्लाह के नबी ﷺ की मोहब्बत है और हर चीज़ से बढ़कर है; न माँ-बाप से ऐसी मोहब्बत होती है, न औलाद से, न बीवी से, न किसी और से। फिर सवाल यह पैदा होता है कि अगर मोहब्बत हर चीज़ से ज़्यादा है तो इताअत (आज्ञाकारिता) क्यों नहीं है? इसलिए कि क़ायदा (नियम) है: تَعْصِي الرَّسُوْلَ وَأَنْتَ تُظْهِرُ حُبَّهُ هٰذَا لَعَمْرِي فِي الْفِعَالِ عَجِيْبُ لَوْ كَانَ حُبُّكَ صَادِقًا لَأَطَعْتَهُ إِنَّ الْمُحِبَّ لِمَنْ يُحِبُّ مُطِيْعُ तू रसूलुल्लाह ﷺ की नाफ़रमानी करता है और आप ﷺ की मोहब्बत का इज़हार भी करता है कि मैं 'आशिक़-ए-रसूल' हूँ, यह तो अजीब व ग़रीब बात है। अगर नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से तेरी मोहब्बत सच्ची होती तो तू नबी ﷺ की इताअत करता, इसलिए कि क़ायदा है कि मुहिब (प्रेमी) हमेशा महबूब (प्रिय) की मर्जी के मुताबिक़ चलता है। मेरे हज़रत ने इसका जवाब देते हुए फ़रमाया कि मोहब्बत की यह चिंगारी नाज़ायज़ ख़्वाहिशात, नफ़्सानी लज़्ज़ात (इंद्रिय सुख), माद्दी तअल्लुक़ात (भौतिक संबंध), दुनियावी मफ़ादात (सांसारिक हित) और आख़िरत से ग़फ़्लत (लापरवाही) की राख में दब गई है। मोहब्बत तो है और सब से बढ़कर है, मगर ख़्वाहिशात और ग़फ़्लत की राख में दब गई है। इसे ज़रा बाहर निकालो और ज़िक्र-ए-इलाही की हवा दो, फिर इसकी गर्मी देखो। राख के नीचे दिल के अंदर इश्क़-ए-नव्वी की जो चिंगारी है, वह आग बनेगी और फिर भड़कने लगेगी, और जब यह भड़क उठेगी तो फिर इसकी चमक और महक पूरे आलम (संसार) में आम हो जाएगी। ___________📝📝___________ (किताब : रहमतुल-लिल-आलमीन ﷺ की चमक और महक। सफ़ा नंबर : 28-29-30 मुसन्निफ़ : हज़रत मौलाना मोहम्मद सलीम साहब धोरत) चयन : इस्लामिक ट्यूब प्रो ऐप

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