عربی ششم

تشریح الہدایہ شرح اردو ہدایہ جلد ۱۱
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میزان العلوم شرح سلم العلوم
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تفہیم المتعلم شرح اردو تعلیم المتعلم
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الدرس الحاوی شرح اردو عقیدۃ الطحاوی
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نفحات التنقیح فی شرح مشکوۃ المصابیح (مکمل سیٹ)
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اصول ہدایہ جلد ۳، ۴
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خلاصۃ السراجی علی الترتیب الدراسی
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آسان شرح عقائد
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تسہیل شرح نخبۃ الفکر
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खाना किसने भेजा?

खाना किसने भेजा?

इमाम क़ुर्तुबी (रह.) फ़रमाते हैं कि क़बीला-ए-अशअरीयीन के लोग जब हिजरत करके मदीना मुनव्वरा पहुँचे, तो उनका खाने-पीने का तमाम सामान ख़त्म हो चुका था। चुनाँचे उन्होंने अपना एक आदमी रसूलुल्लाह ﷺ की ख़िदमत में भेजा कि हमारे खाने-पीने का कोई इंतज़ाम किया जाए। वह आदमी जब रसूलुल्लाह ﷺ के घर के दरवाज़े पर पहुँचा, तो रसूलुल्लाह ﷺ की आवाज़ आ रही थी जो क़ुरआन पाक की इस आयत की तिलावात कर रहे थे: “वमा मिन दाब्बतिन फ़िल-अर्ज़ि इल्ला अलल्लाहि रिज़क़ुहा” (और ज़मीन पर चलने वाला कोई ऐसा जीव नहीं है जिसका रिज़्क़ अल्लाह के ज़िम्मे न हो)। यह आयत सुनते ही उसके दिल में ख़्याल आया कि जब अल्लाह तआला ने हर एक के रिज़्क़ का ज़िम्मा लिया है, तो फिर हम तो इंसान हैं, जानवरों से गए-गुज़रे नहीं। वह ज़रूर हमारे लिए रिज़्क़ का बंदोबस्त करेगा। वह वहीं से वापस आ गया और रसूलुल्लाह ﷺ को कुछ नहीं बताया। साथियों के पास पहुँचा तो सबको बुलंद आवाज़ से कहा: "साथियों ख़ुश हो जाओ, अल्लाह की मदद आने वाली है।" वे समझे कि यह बंदा चूंकि रसूलुल्लाह ﷺ के पास अर्ज़ करने गया था, इसलिए रसूलुल्लाह ﷺ ने खाना भेजने का वादा कर लिया होगा। लिहाज़ा वे ख़ुशी-खुशी अपने कामों में लग गए और मुतमइन (संतुष्ट) हो गए। थोड़ी ही देर गुज़री थी कि दो बंदे एक बड़ा सा बर्तन लेकर आए जो गोश्त और रोटियों से भरा हुआ था। वे दो बंदे खाना देकर चले गए। सब ने शिकम-सैर होकर (पेट भरकर) ख़ूब खाया, लेकिन अब भी काफ़ी सारा खाना बच गया था। उन्होंने सोचा कि यह बचा हुआ खाना रसूलुल्लाह ﷺ की ख़िदमत में वापस भेज दें ताकि वक़्त-ए-ज़रूरत काम आ सके। दो आदमी खाना लेकर नबी करीम ﷺ की ख़िदमत में हाज़िर हुए और कहा, "या रसूलुल्लाह! आपका भेजा हुआ खाना बहुत मज़ेदार था।" रसूलुल्लाह ﷺ ने जब यह सुना तो फ़रमाया, "मैंने तो कोई खाना नहीं भेजा था।" एक बंदे ने कहा, "या रसूलुल्लाह! हम बहुत भूखे थे, हमने भूख की हालत में आपकी तरफ़ अपना बंदा भेजा था कि हमें थोड़ा खाना इनायत फ़रमाएँ।" इतने में वह बंदा भी आया, उसने कहा, "या रसूलुल्लाह! जब मैं आया तो आप क़ुरआन पाक की आयत: 'वमा मिन दाब्बतिन फ़िल-अर्ज़ि इल्ला अलल्लाहि रिज़क़ुहा' पढ़ रहे थे, लिहाज़ा मैंने सोचा कि जो ज़ात जानवरों के रिज़्क़ की ज़िम्मेदारी उठा रही है, वह ज़ात हमारी भी ज़िम्मेदार है। इसलिए मैं आपको कुछ बताए बग़ैर चला गया।" तब रसूलुल्लाह ﷺ मुस्कुराए और फ़रमाया: "यह रिज़्क़ मैंने नहीं, बल्कि उस परवरदिगार ने भेजा था जो हर शय (चीज़) के रिज़्क़ का ज़िम्मेदार है।" ___________📝📝📝___________ मनक़ूल (उद्धृत) - चयन: इस्लामिक ट्यूब प्रो ऐप

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