عربی ششم

الکاملة لحل اسئلة الکتب الخمسہ
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عین الہدایہ اردو شرح ہدایہ جلد ٥
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عین الہدایہ اردو شرح ہدایہ جلد ٦
عین الہدایہ اردو شرح ہدایہ جلد ٦
عین الہدایہ اردو شرح ہدایہ جلد ٧
عین الہدایہ اردو شرح ہدایہ جلد ٧
عین الہدایہ اردو شرح ہدایہ جلد ٨
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کتاب التعریفات
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اثمار الہدایہ علی الہدایہ جلد ٨
اثمار الہدایہ علی الہدایہ جلد ٨
اثمار الہدایہ علی الہدایہ جلد ٩
اثمار الہدایہ علی الہدایہ جلد ٩
اثمار الہدایہ علی الہدایہ جلد ١٢
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रिश्ते तय करने में दोहरे मापदंड: 'लड़की देखने' की रस्म का दर्दनाक सच

रिश्ते तय करने में दोहरे मापदंड: 'लड़की देखने' की रस्म का दर्दनाक सच

हमारे समाज में जब अपने बेटे या भाई के लिए रिश्ता ढूंढा जाता है, तो... लड़की की खूबसूरती, लड़की की शराफ़त, लड़की के काम-काज, लड़की का रहन-सहन, लड़की की तालीम (शिक्षा), लड़की का खानदान, लड़की का दहेज, लड़की का जायदाद में हिस्सा और लड़की की पैदाइश से लेकर उसकी जवानी तक की हिस्ट्री (इतिहास)—जिसकी गवाही भी शर्त होती है। और लड़के के लिए सिर्फ उसकी नौकरी होना ही बहुत है; न शक्ल-ओ-सूरत अहम, न किरदार अहम, न चाल-चलन अहम, न उसके दोस्त-अहबाब (मित्र) अहम, न उसका घर वालों से राब्ता (संबंध) अहम, न उसके इश्क़-मुआशक़े अहम... बस एक नौकरी उसके 100 ऐबों (दोषों) पर पर्दा डाल देती है। और सबसे बड़ा अलमिया (त्रासदी) यह है कि किसी की बेटी या बहन के घर जब देखने जाते हैं, तो पहले कहलवा भेजते हैं कि "लड़की देखने आ रहे हैं"। वहाँ लड़की के दिल पर क्या गुज़रती है, जो दिल और दिमाग में मरती-तड़पती, दुआएं मांगती, सोचती और पागल होती रहती है... "क्या होगा? मैं पसंद आऊँगी या नहीं? पसंद न आई तो लोग क्या कहेंगे? पसंद आ भी गई तो वो लोग कैसे होंगे? वो लड़का कैसा होगा?" जैसे हज़ारों सवाल। और ऊपर से जहालत (अज्ञानता) यह कि वो लोग दूसरों की बहन-बेटियों को बुलाते हैं और लड़की को सबके सामने चलने के लिए कहा जाता है। जैसे मंडी में भेड़-बकरियों को कुछ क़दम चलाकर पसंद किया जाता है, उसके कमरे को जाकर देखते हैं, उनके घर खा-पीकर फिर वापस अपने घर पहुँचकर एक मैसेज भेज देते हैं—"माफ़ करना हमें लड़की पसंद नहीं!!" इन जैसे लोगों को तेल की गर्म कढ़ाही में डाल देना चाहिए! ज़ालिमों!!! एक नहीं, 10 बार रिश्ता न करो, मगर वहाँ लड़की देखने किसी बहाने से भी जाया जा सकता है। जब तक पसंद न आए, रिश्ते की बात न किया करो। वह लड़की है, फ़रिश्ता नहीं! परी नहीं! एक सादा सी, मासूम सी इंसान है, जिसके कुछ जज़बात हैं, कुछ ख़्वाब हैं और उसका भी कोई इज़्ज़त-ए-नफ़्स (आत्मसम्मान) है। ख़ुदारा (भगवान के लिए) अपने चाँद जैसे बेटों के लिए परियाँ ज़रूर ढूँढें, मगर किसी की बहन-बेटी पर ऐब लगाकर नहीं, किसी की आह लेकर नहीं, किसी की बददुआ लेकर नहीं! ___________📝📝📝___________ मनकूल (साभार) चयन: इस्लामिक ट्यूब ऐप

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