علماء دیوبند کون ہیں اور کیا ہیں

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सच कहो और अमर रहो

सच कहो और अमर रहो

एक बार एक राजा सैनिकों के लंगर खाने (रसोई) में गया, साफ-सफाई की जांच की जो बिल्कुल ठीक थी। फिर उसने पूछा कि जवानों के लिए क्या पकाया गया है? जवाब मिला: 'बताऊं' यानी बैंगन। राजा बहुत नाराज़ हुआ कि जवानों के लिए इतना घटिया खाना क्यों पकाया गया है? उसके सलाहकार ने बैंगन की बुराई में ज़मीन-आसमान एक कर दिए। खैर, लंगर कमांडर ने माफ़ी मांगी और भविष्य में बैंगन न पकाने और अच्छा खाना पकाने का वादा किया, जिसके बाद राजा लंगर खाने से रवाना हो गया। कुछ समय बीतने के बाद, राजा का दोबारा सैनिकों के लंगर खाने जाना हुआ। संयोग से उस दिन भी बैंगन ही पकाए गए थे। इस बार राजा ने बैंगन की तारीफ़ की। वही सलाहकार उनके साथ था, उसने बैंगन की तारीफ़ में मुमकिन हद से भी आगे बढ़कर उसके फायदे गिना दिए, मानो बैंगन का मुकाबला करने वाली कोई सब्ज़ी या पकवान दुनिया में बचा ही न हो। लंगर कमांडर खुश हुआ और आगे से लगातार और नियमित रूप से बैंगन पकाने का वादा किया। राजा उस सलाहकार की तरफ मुड़ा और कहने लगा, 'उस दिन मैंने बैंगन की बुराई की तो तुमने उसकी बुराई करने में कोई कसर नहीं छोड़ी, और आज जब मैंने तारीफ़ की है, तो तुमने उसकी तारीफ़ के पुल बांध दिए, ऐसा क्यों?' उसने जवाब दिया, 'हुज़ूर, मैं आपका गुलाम हूँ, बैंगन का नहीं।' यह सुनकर राजा ने कहा, 'तुम जैसे जी-हज़ूरी करने वाले (चापलूस) हक और सच को सामने नहीं आने देते, जिसके कारण सत्ताधारी अहंकारी हो जाते हैं और इसके परिणामस्वरूप उनसे न्याय नहीं हो पाता। न्याय की हत्या ही कौमों (राष्ट्रों) के पतन का कारण बनती है।' पहले तो वह चापलूस चुप रहा, फिर कहने लगा, 'हुज़ूर, अगर जान की अमान पाऊँ (जान बख्श दी जाए) तो एक अर्ज़ करूँ?' राजा ने कहा, 'कहो, क्या कहना चाहते हो?' 'हुज़ूर, सच और हक की बात कहने वाले हमेशा अपनी जान से हाथ धो बैठे हैं।' राजा ने कहा, 'याद रखो, सच और हक जान से बढ़कर कीमती हैं। मरना तो एक दिन है ही, सच कहते हुए मरोगे तो (इतिहास में) ज़िंदा रहोगे। हाँ, झूठ बोलने या उस पर सही की मुहर लगाने की सूरत में भी तुम (शारीरिक रूप से) ज़िंदा तो रहोगे, लेकिन लानत और फटकार ही इस ज़िंदगी का मुकद्दर बनी रहेगी।'

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