فضائل و مسائل رمضان

فضائل و مسائل رمضان

इस पुस्तक को एक क्लिक के साथ देखें। ऑनलाइन पढ़ें या ऑफलाइन पढ़ने के लिए डाउनलोड करें।

ارے بھائی!

اگر آپ ہزاروں کتابیں، نعتیں، تصاویر، ویڈیوز، اخبار، مضامین، قبلہ نما، اوقات نماز، اسلامک گھڑی اور بہت کچھ آسانی کے ساتھ حاصل کرنا چاہتے ہیں تو بس ہمارے Islamic Tube ایپ کو پلے سٹور سے انسٹال کرو، اور بالکل مفت اور آسانی کے ساتھ اسلامک مواد حاصل کرو

ڈاؤن لوڈ کریں

बच्चों की परवरिश का तरीक़ा: परवरिश की नियमावली

बच्चों की परवरिश का तरीक़ा: परवरिश की नियमावली

(१) अल्लाह तआला जब किसी को औलाद दे और वह सयानी (समझदार) होने लगे, तो सबसे पहले उसको कलमा-ए-तौहीद (एकेश्वरवाद का मूलमंत्र) सिखाए। फिर उसको ज़रूरी आदाब (शिष्टाचार) सिखाए। (२) जब सामने आए तो सलाम करे। (३) झूठ बोलने से उसको नफ़रत दिलाए। (४) पर्दा और हया (शालीनता) की उसको शिक्षा (ताकीद) करे। (५) लड़कों और लड़कियों को एक जगह न खेलने दे। अगर वे ना-महरम हैं तो यह भविष्य की बुराइयों और ख़राबियों की रोकथाम है, और अगर वे महरम हैं तो लड़कियों में बेहयाई पैदा होने का और लड़कों में बुद्धि के नुक़सान की संभावना है। (६) खुद भी बच्चों के सामने कोई अनुचित या बेहयाई का काम न करे, चाहे बच्चा इतना छोटा हो कि बोल भी न सकता हो। क्योंकि इस काम का अक्स (प्रतिबिंब) उसके दिमाग़ में छप जाता है, फिर उसका असर बड़ा हो जाने के बाद ज़ाहिर होता है। (७) यौन या अश्लील दिल्लगी (मज़ाक) की आदत उसमें पैदा न होने दे, क्योंकि इससे ढिठाई और बेबाकी पैदा होती है। (८) इसका पूरा ध्यान रखें कि सयाने (समझदार) बच्चों में आपस में गहरी दोस्ती पैदा न होने पाए, क्योंकि इससे बेशुमार बुराइयाँ और ख़राबियाँ पैदा होंगी। अगर उनके साथ खेलने में कोई भलाई या ज़रूरत हो, तो उस खेल के वक़्त खुद मौजूद रहें, बाद में मेल-जोल न होने दें। (९) उसकी आदत डालें कि वह छुपकर कोई काम न करे। बच्चा छुपकर वही काम करेगा जिसे वह बुरा समझेगा। तो मानो वह शुरू ही से बुरा काम करने का आदी हो जाएगा। (१०) इसकी भी आदत डालें कि 'सुख़न परवरी' (बिना वजह की तरफ़दारी या हठधर्मिता) कभी न करे। हक़ (सच्चाई) साफ़ हो जाने के बाद चाहे अपने से कम दर्जे का आदमी ही उस पर आगाह करे, लेकिन फ़ौरन उसकी बात मान ले और हर बात में उसको तवाज़ो (विनम्रता) व ख़ाकसारी की आदत डाले। (इस्लाह-ए-इंक़िलाब, पृ. २०४) उसकी यह आदत डालें कि अगर उससे ग़लती हो जाए तो वह उसका इक़रार (स्वीकार) कर लिया करे, और अगर वह ग़लती 'मुतअद्दी' हो (यानी किसी दूसरे व्यक्ति से उसका संबंध हो), तो साहब-ए-हक़ (जिसका हक़ हो) से माफ़ी मंगवाई जाए। इसकी आदत डालना बहुत ज़रूरी है, क्योंकि इसमें उसके दीन की सलामती और दुनिया का सुकून व इज़्ज़त है, और इससे पीछे हटना तकब्बुर (अहंकार) है और हमेशा के लिए ज़िल्लत व नफ़रत का कारण बनता है। (इस्लाह-ए-इंक़िलाब, पृ. २०४) _____________________________________ किताब: तरबियत-ए-औलाद सफ़्हा नंबर: ७० / ७१ लेखक: हकीम-उल-उम्मत मौलाना अशरफ़ अली थानवी (रहमतुल्लाह अलैह) चयन: इस्लामिक ट्यूब प्रो ऐप

सबसे हालिया