ماہنامہ فیضانِ اشرف (نومبر)

ماہنامہ فیضانِ اشرف (نومبر)

इस पुस्तक को एक क्लिक के साथ देखें। ऑनलाइन पढ़ें या ऑफलाइन पढ़ने के लिए डाउनलोड करें।

ارے بھائی!

اگر آپ ہزاروں کتابیں، نعتیں، تصاویر، ویڈیوز، اخبار، مضامین، قبلہ نما، اوقات نماز، اسلامک گھڑی اور بہت کچھ آسانی کے ساتھ حاصل کرنا چاہتے ہیں تو بس ہمارے Islamic Tube ایپ کو پلے سٹور سے انسٹال کرو، اور بالکل مفت اور آسانی کے ساتھ اسلامک مواد حاصل کرو

ڈاؤن لوڈ کریں

अल्लाह वालों की सोहबत (संगत) का असर

अल्लाह वालों की सोहबत (संगत) का असर

हज़रत मौलाना यूसुफ़ बनूरी (रहमतुल्लाही अलैहि) ने एक मर्तबा एक मजलिस (सभा) में इर्शाद फ़रमाया कि: एक साल हम हज के लिए गए, वहाँ उलेमा (विद्वानों) के ग्रुप में एक रिटायर्ड फ़ौजी अफ़सर भी था। तहज्जुद के वक़्त वह फ़ौजी अफ़सर हम सब से पहले उठकर बैतुल्लाह शरीफ़ चला जाता और उस वक़्त तवाफ़ करता था। मौलाना फ़रमाते हैं: "मैं हैरान होता कि वह एक आम आदमी है और मैं शैख़ुल हदीस, देवबंद का फ़ाज़िल (स्नातक), अल्लामा अनवर शाह कश्मीरी (रहमतुल्लाही अलैहि) जैसे मुहद्दिस का शागिर्द और उस्ताज़ुल उलेमा (उलेमा का शिक्षक) हूँ; मगर यह आम सा मुसलमान, वह भी रिटायर्ड फ़ौजी अफ़सर, जो मुझसे बड़ा आबिद-ओ-ज़ाहिद (इबादत गुज़ार) है।" मौलाना बनूरी (रहमतुल्लाही अलैहि) फ़रमाते हैं कि: "मैंने एक दफ़ा इरादा किया कि अब मैं इससे पहले तहज्जुद के लिए उठा करूँगा। सो जब मैं रात को उठा तो यह देखकर इत्मीनान हुआ कि वह अपने बिस्तर में सोया हुआ है। मैं बड़ा ख़ुश हुआ कि शुक्र है आज मैं इबादत गुज़ार आम से मुसलमान पर फ़ौक़ियत (बढ़त) ले गया। हम्माम (वाशरुम) से वज़ू वगैरह से फ़ारिग़ होकर जब मैं कमरे में आया तो देखा वह रिटायर्ड फ़ौजी अफ़सर मेरे लिए चाय का कप लेकर खड़ा है। मैं हैरान हुआ कि यह बंदा तो अभी बिस्तर में लेटा हुआ था, यह इतनी जल्दी बाहर से चाय लेकर भी आ गया है! मगर जब बिस्तर पर निगाह डाली तो देखा कि उसके बिस्तर में कोई सोया हुआ है। मैंने पूछा, 'मियाँ! आप इंसान हो या जिन्न? यह आपके बिस्तर में आप नहीं तो यह कौन है?' उसने हँसकर कहा, 'मौलाना! मैं इंसान ही हूँ। मैं जब तहज्जुद से ज़रा पहले हरम शरीफ़ गया तो मैंने वहाँ एक नावाक़िफ़ (अजनबी) हाजी साहब को बुख़ार में मुब्तला (पीड़ित) देखा। मुझसे रहा न गया और मैं उन्हें अपनी क़ियामगाह (रुकने की जगह) पर यहाँ ले आया। उनको अपने बिस्तर में सुलाकर वापस हरम शरीफ़ चला गया था। सो बिस्तर में यह मैं नहीं बल्कि बीमार हाजी साहब हैं।'" हज़रत बनूरी (रहमतुल्लाही अलैहि) ने हैरतज़दा होकर उससे पूछा कि, "मियाँ! आप कौन हो जिसने यानी एक रिटायर्ड फ़ौजी ने मुझ आलिम और शैख़ुल हदीस को, देवबंद के फ़ाज़िल को, उस्ताज़ुल उलेमा को, बहुत बड़े मदरसे के मोहतमिम (प्रिंसिपल) को, उलेमा के ग्रुप लीडर को ज़ुह्द-ओ-तक़्वा (परहेज़गारी) में पीछे छोड़ दिया है? आज मैंने इरादा किया था कि आज के बाद आपसे पहले उठूँगा और आपसे पहले हरम जाऊँगा लेकिन मैं आपका मुक़ाबला न कर सका। सच-सच बता दें कि आप हैं कौन?" उस फ़ौजी अफ़सर ने जवाब दिया कि: "मैं शैख़ुत तफ़्सीर मौलाना अहमद अली लाहौरी (रहमतुल्लाही अलैहि) का मुरीद (शिष्य) हूँ।" मौलाना बनूरी (रहमतुल्लाही अलैहि) फ़रमाते हैं: "मैंने अपने आप पर अफ़सोस किया कि क़ुत्बुल अक़्ताब मौलाना अहमद अली लाहौरी (रहमतुल्लाही अलैहि) से निस्बत (जुड़ाव) की वजह से एक आम से मुसलमान को अल्लाह के यहाँ कितना ख़ास मक़ाम (स्थान) हासिल है।" इस वाक़िये (घटना) से यह पता चलता है कि अल्लाह वालों की सोहबत (संगत) से इतना बुलंद मक़ाम मिलता है कि अगर मुरीद आम सा मुसलमान भी हो तो वह अमल (कर्म) के लिहाज़ से बड़े-बड़े अहल-ए-इल्म (विद्वानों) से आगे निकल जाता है। दुआ है अल्लाह तआला हमें भी नेक लोगों की क़द्र करने और उनकी सोहबत से फ़ायदा उठाने की हिम्मत-ओ-तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन।

सबसे हालिया