ارشاد الحواشی شرح اردو اصول الشاشی
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एक अरब डॉक्टर और धार्मिक विद्वान की छात्र को महत्वपूर्ण नसीहत

एक अरब डॉक्टर और धार्मिक विद्वान की छात्र को महत्वपूर्ण नसीहत

सवाल किया गया: शुरुआती छात्र के लिए कोई संक्षिप्त नसीहत? मैंने बार-बार नसीहत की है, मगर जानता हूँ कि हर नसीहत का पहला मुखातिब (संबोधित) खुद मेरा दिल है। लेकिन शायद दोहराने में हिकमत (बुद्धिमानी) हो और फायदा पहुँचे: जान लो, ऐ मेरे प्यारे बेटे, वह ज़माना गुज़र चुका, जब इल्म-ए-रिवायत व दिरायत (पारंपरिक और बौद्धिक ज्ञान) का व्यापक विद्वान मौजूद था, जिसके पास ज्ञान के प्यासे सफर करते और अदब के साथ बैठते थे। वह दौर अब इतिहास के पन्नों में दफन हो चुका है। आज का दौर मुश्किलों और आज़माइशों का दौर है, जहाँ नाअहल (अयोग्य) लोग मार्गदर्शक बन गए हैं, जाहिल खतीब (वक्ता), किस्सागो वाइज़ (कहानियां सुनाने वाले उपदेशक), और फरेबी लोग प्रमुख हैं। मामले उन लोगों के सुपुर्द हो चुके हैं जो इसके अहल (योग्य) न थे, सिवाय उनके जिन्हें अल्लाह ने अपनी रहमत से महफूज़ रखा। ऐसे हालात में, ऐ छात्र, अपने घर को अपनी पनाहगाह बनाओ और अपनी लाइब्रेरी को अपना स्थायी कैदखाना। इसमें खुद को उस वक्त तक महसूर (कैद) कर लो, जब तक मौत तुम्हें आ न जाए या करीब न हो जाए। लेकिन याद रखो, अगर तुमने अध्ययन के लिए सही किताबों का चयन किया, तो यही कैदखाना तुम्हारे लिए 'ग़ार-ए-हिरा' बन जाएगा, जहाँ से नुबुव्वत (पैगंबरी) की रोशनी चमकी और धरती को न्याय और सत्य से रोशन कर दिया। किताबों को थाम लो, कि यही तुम्हारी निजात (मुक्ति) की कश्ती हैं। इनके ज़रिए तुम ज्ञान और हिकमत के समुद्रों में सफर करोगे और दुनिया के उन कोनों तक पहुँचोगे जहाँ अज्ञानता के साए छाए हैं। कभी अपनी ज़ात को कमतर न जानो और अपने वजूद को मामूली मत समझो। जान लो कि तुम्हारे और एक महान शख्सियत के बीच का फर्क सिर्फ इरादे की ताकत और मक़सद के निर्धारण का है। याद रखो, इतिहास में ऐसे दौर भी आए हैं जो एक इंसान के नाम से जुड़ गए, जैसे वोल्टेयर (Voltaire)। इसलिए, खुद को वह शख्स बनाओ जो इतिहास का शीर्षक बन सके। अपने आप को वह महदी समझो जिसे दुनिया का मार्गदर्शन करना है, और किसी दूसरे के इंतज़ार में वक्त ज़ाया मत करो। और यह भी याद रखो, अगर तुम वाकई अपने उस्तादों (शिक्षकों) के हक में वफादार हो, तो तुम पर लाज़िम (अनिवार्य) है कि उनसे आगे के फिक्री आफ़ाक़ (वैचारिक क्षितिज) तक पहुँचो, उन मंज़िलों तक जाओ जहाँ उनके कदम न पहुँचे, उन जहानों को खोजो जिनका उन्होंने तसव्वुर (कल्पना) तक न किया था। और खबरदार, मायूस करने वालों और झूठी बातों का प्रोपेगैंडा करने वालों से दूर रहो।

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