الہدایہ مع احادیثھا و اصولھا جلد ۵
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खामोश परिंदा

खामोश परिंदा

हज़रत सुलेमान (अलैहिस्सलाम) के दौर में एक शख़्स ने एक ख़ूबसूरत परिंदा ख़रीदा। वह जब चहचहाता तो उसकी अत्यंत दिलकश और सुरीली आवाज़ से वह शख़्स बहुत ख़ुश होता, मानो उस परिंदे की आवाज़ बहुत ही मीठी और प्यारी थी। एक दिन अचानक उस पिंजरे के पास उसी की तरह का एक और परिंदा आया और अपनी ज़बान में कुछ बातें करके चला गया। पिंजरे में मौजूद परिंदा बिल्कुल ख़ामोश हो गया, जैसे वह गूँगा हो गया हो। उसके मालिक ने दो-तीन दिन इंतज़ार किया लेकिन परिंदा बिल्कुल ख़ामोश रहा... वह शख़्स हज़रत सुलेमान (अलैहिस्सलाम) की बारगाह में उस परिंदे को पिंजरे समेत लाया और शिकायत की कि मैंने यह बहुत महँगा परिंदा ख़रीदा था, इसकी आवाज़ मुझे ख़ुश करती थी लेकिन अब न जाने क्या हुआ कि यह बोलता ही नहीं! हज़रत सुलेमान (अलैहिस्सलाम) (जो जानवरों और परिंदों की बोलियाँ जानते थे) ने उस परिंदे से पूछा, "क्या वजह है जो तुम ख़ामोश हो गए हो?" वह परिंदा अर्ज़ करने लगा, "ऐ अल्लाह के बरहक़ नबी! यह शख़्स समझता है कि मैं ख़ुश होकर चहचहाता हूँ, लेकिन हक़ीक़त यह है कि मैं दूसरे आज़ाद परिंदों को देखकर रोता हूँ कि काश मैं भी आज़ाद होता तो कितना अच्छा होता। लेकिन यह मेरी ज़बान नहीं समझता, इसलिए यह सोचता है कि मैं बहुत ख़ुशी से गा रहा हूँ। फिर एक दिन मेरी ही नस्ल का एक परिंदा मेरे पास आया और उसने कहा, 'यह शख़्स तुम्हारी ज़बान नहीं समझता, बल्कि समझता है कि तुम बहुत सुरीली आवाज़ में ख़ुशी-ख़ुशी चहचहा रहे हो। अगर तुम इसकी क़ैद से आज़ाद होना चाहते हो, तो रोना छोड़ दो और फ़रियाद करना भी छोड़ दो, क्योंकि तुम्हारे अलफ़ाज़ का इस पर कोई असर नहीं होता, क्योंकि यह तुम्हारे दर्द को समझ ही नहीं सकता।' बस फिर क्या था, मैं तब से ख़ामोश होकर सब्र कर रहा हूँ।" हज़रत सुलेमान (अलैहिस्सलाम) ने उस शख़्स से कहा, "पिंजरा खोल दो और इसे आज़ाद कर दो, क्योंकि अब यह पिंजरे में कभी नहीं बोलेगा।" उस शख़्स ने कहा, "अगर अब इसने ख़ामोश ही रहना है, तो बिना वजह इसे रखकर मैं क्या करूँगा?" लिहाज़ा उसने हज़रत सुलेमान (अलैहिस्सलाम) के हुक्म का पालन करते हुए पिंजरा खोल दिया। वह परिंदा फ़ौरन उड़कर पेड़ की डाल पर बैठा और उस शख़्स की तरफ़ देखकर कुछ चहचहाया और उड़ गया। उस शख़्स ने हज़रत सुलेमान (अलैहिस्सलाम) से अर्ज़ की, "यह क्या कहकर गया है?" आप (अलैहिस्सलाम) ने फ़रमाया, "उसने कहा है कि अगर तू भी अपने ग़मों और मुसीबतों से आज़ाद होना चाहता है, तो ख़ामोश हो जा और सब्र कर। किसी से कोई शिकायत न कर, तो तुझे भी एक दिन उन सारे ग़मों से नजात (मुक्ति) मिल जाएगी जो तू लोगों को सुनाता रहता है, जबकि वे बे-अहसास (संवेदनहीन) लोग तेरी ज़बान जानने के बावजूद तेरी बात नहीं सुनते।" यह एक हिकायत (बोधकथा) है। यह झूठी है या सच्ची, इस बहस में न पड़ें; इस तरह की हिकायतों से नसीहत और सबक़ हासिल किया जाता है। __________📝📝__________ मनक़ूल (उद्धृत)। चयन: इस्लामिक ट्यूब प्रो ऐप

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