تحفة الأحوذي بشرح جامع الترمذی الجزء الخامس
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खानदान और खून की पहचान

खानदान और खून की पहचान

सुल्तान महमूद गज़नवी का दरबार लगा हुआ था। दरबार में हज़ारों लोग शामिल थे जिनमें औलिया, कुत्ब और अब्दाल भी थे। सुल्तान महमूद ने सबको संबोधित करके कहा, "क्या कोई शख्स मुझे हज़रत ख़िज़्र अलैहिस्सलाम की ज़ियारत (मुलाकात) करा सकता है?" सब खामोश रहे। दरबार में बैठा एक गरीब ग्रामीण (देहाती) खड़ा हुआ और कहा, "मैं ज़ियारत करा सकता हूँ।" सुल्तान ने शर्तें पूछीं तो वह अर्ज़ करने लगा, "छह महीने दरिया के किनारे चिल्ला काटना होगा, लेकिन मैं एक गरीब आदमी हूँ, मेरे घर का खर्चा आपको उठाना होगा।" सुल्तान ने शर्त मंज़ूर कर ली; उस शख्स को चिल्ले के लिए भेज दिया गया और घर का खर्चा बादशाह के ज़िम्मे हो गया। छह महीने गुज़रने के बाद सुल्तान ने उस शख्स को दरबार में हाज़िर किया और पूछा। तो देहाती कहने लगा, "हुज़ूर! कुछ वज़ीफ़े उल्टे हो गए हैं, लिहाज़ा छह महीने और लगेंगे।" मज़ीद (और) छह महीने गुज़रने के बाद सुल्तान महमूद के दरबार में उस शख्स को दोबारा पेश किया गया तो बादशाह ने पूछा, "मेरे काम का क्या हुआ...?" यह बात सुनकर देहाती कहने लगा, "बादशाह सलामत! कहाँ मैं गुनहगार और कहाँ हज़रत ख़िज़्र अलैहिस्सलाम! मैंने आपसे झूठ बोला... मेरे घर का खर्चा पूरा नहीं हो रहा था, बच्चे भूख से मर रहे थे, इसलिए ऐसा करने पर मजबूर हुआ..." सुल्तान महमूद गज़नवी ने अपने एक वज़ीर (मंत्री) को खड़ा किया और पूछा, "इस शख्स की सज़ा क्या है?" वज़ीर ने कहा, "इस शख्स ने बादशाह के साथ झूठ बोला है। लिहाज़ा इसका गला काट दिया जाए।" दरबार में एक नूरानी चेहरे वाले बुज़ुर्ग भी तशरीफ़ फरमा थे, कहने लगे, "बादशाह सलामत! इस वज़ीर ने बिल्कुल ठीक कहा..." बादशाह ने दूसरे वज़ीर से पूछा, "आप बताओ?" उसने कहा, "इस शख्स ने बादशाह के साथ फ्रॉड (धोखा) किया है, इसका गला न काटा जाए बल्कि इसे कुत्तों के आगे डाला जाए ताकि यह ज़लील होकर मरे और इसे मरने में कुछ वक्त तो लगे।" दरबार में बैठे उसी नूरानी चेहरे वाले बुज़ुर्ग ने कहा, "बादशाह सलामत! यह वज़ीर बिल्कुल ठीक कह रहा है।" सुल्तान महमूद गज़नवी ने अपने प्यारे गुलाम अयाज़ से पूछा, "तुम क्या कहते हो?" अयाज़ ने कहा, "बादशाह सलामत! आपकी बादशाही से एक साल एक गरीब के बच्चे पलते रहे, आपके खज़ाने में कोई कमी नहीं आई और न ही इसके झूठ से आपकी शान में कोई फर्क पड़ा। अगर मेरी बात मानें, तो इसे माफ़ कर दें, अगर इसे कत्ल कर दिया तो इसके बच्चे भूख से मर जाएँगे..." अयाज़ की यह बात सुनकर महफ़िल में बैठे वही नूरानी चेहरे वाले बाबा कहने लगे, "अयाज़ बिल्कुल ठीक कह रहा है।" सुल्तान महमूद गज़नवी ने उन बाबा जी को बुलाया और पूछा, "आपने हर वज़ीर के फैसले को दुरुस्त (सही) कहा, इसकी वजह मुझे समझाई जाए।" बाबा जी कहने लगे: "बादशाह सलामत! पहले नंबर पर जिस वज़ीर ने कहा कि इसका गला काटा जाए, वह कौम का कसाई है और कसाई का काम है गले काटना। उसने अपना खानदानी रंग दिखाया। गलती उसकी नहीं आपकी है कि आपने एक कसाई को वज़ीर बना लिया। दूसरा जिसने कहा कि इसे कुत्तों के आगे डाला जाए, उस वज़ीर का वालिद (पिता) बादशाहों के कुत्ते नहलाया करता था, कुत्तों से शिकार खेलता था। उसका काम ही कुत्तों का शिकार है, तो उसने अपने खानदान का तारुफ़ (परिचय) कराया। आपकी गलती है कि ऐसे शख्स को वज़ारत (मंत्रालय) दी। जहाँ ऐसे लोग वज़ीर हों, वहाँ लोगों ने भूख से ही मरना है। और तीसरा, अयाज़ ने जो फैसला किया तो सुल्तान महमूद सुनो! अयाज़ सैयद ज़ादा है। सैयद की शान यह है कि सैयद अपना सारा खानदान कर्बला में ज़बह करा देता है मगर बदला लेने का कभी नहीं सोचता।" सुल्तान महमूद अपनी कुर्सी से खड़ा हो जाता है और अयाज़ को संबोधित करके कहता है, "अयाज़! तुमने आज तक मुझे क्यों नहीं बताया कि तुम सैयद हो?" अयाज़ कहता है, "आज तक किसी को इस बात का इल्म (ज्ञान) न था कि अयाज़ सैयद है। लेकिन आज बाबा जी ने मेरा राज़ खोला, आज मैं भी एक राज़ खोल देता हूँ। ऐ बादशाह सलामत! यह बाबा कोई आम हस्ती नहीं, यही हज़रत ख़िज़्र अलैहिस्सलाम हैं।" मनकूल (नकल किया गया)।

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