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एक व्यक्ति आपके पास आया और अर्ज़ किया कि कुछ नसीहत फ़रमाइए। आपने फ़रमाया, "छह (6) बातें बताता हूँ, उन पर अमल करो, फिर कुछ भी करोगे तो नुक़सान न पहुँचेगा।" आपने उन छह बातों की व्याख्या इस तरह की: 1. जब गुनाह करो तो उसकी (अल्लाह पाक की) नेमत मत खाओ। दुनिया में जो कुछ भी है, वह उसी की नेमत है; क्या यह शर्म की बात नहीं है कि उसकी नेमत से फ़ायदा उठाओ और फिर भी गुनाह करो? 2. अगर गुनाह करना चाहो तो उसके मुल्क से बाहर चले जाओ। पूर्व से पश्चिम तक उसी का मुल्क है; यह अच्छा नहीं मालूम होता कि उसके मुल्क में रहकर उसकी नाफ़रमानी की जाए। 3. अगर गुनाह करो तो ऐसी जगह करो जहाँ अल्लाह तआला तुझको न देखता हो। क्या यह शर्म की बात नहीं है कि उसके मुल्क में रहो, उसका रिज़्क़ खाओ और फिर उसके सामने गुनाह करो? 4. जब मलक-उल-मौत (मौत का फ़रिश्ता) रूह क़ब्ज़ करने के लिए आएँ तो उनसे कहो कि इतनी मोहलत दीजिए कि तौबा कर लूँ। अगर तुझको इतनी क़ुदरत हासिल नहीं है कि मलक-उल-मौत को अपने पास से वापस कर दे, तो बेहतर यही है कि मलक-उल-मौत के आने से पहले तौबा कर ले। 5. जब मुनकर-नकीर तेरी क़ब्र में आएँ तो तू उनको किसी बहाने से अपने पास से वापस कर दे। अगर यह बात मुश्किल है, तो तुझको चाहिए कि उनके आने से पहले जवाब तैयार रख ताकि उस समय परेशानी न हो। 6. जब क़ियामत के दिन गुनाहगारों को दोज़ख़ (नरक) में भेजा जाने लगे तो तू दोज़ख़ में जाने से इंकार कर दे। अगर यह मुमकिन नहीं, तो फिर ऐसा कोई काम करना चाहिए जिससे तू अज़ाब (عذاب) में गिरफ़्तार न हो। यह सब बातें सुनकर उस व्यक्ति ने अर्ज़ किया कि वह मतलब बख़ूबी समझ गया। उस व्यक्ति ने उसी समय तौबा की और आपकी ख़िदमत में रहने लगा। ------------------------------------------------------- किताब: अल्लाह के आशिक़ों की आशिक़ी का मंज़र (पृष्ठ संख्या 153) लेखक: मौलाना अर्सलान अख्तर मेमन चयन: इस्लामिक ट्यूब प्रो ऐप
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