درسِ مشکوۃ جلد 2
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जादुई मशीन

जादुई मशीन

यह कहानी सीरिया (शाम) में घटित हुई, जिसे एक दर्ज़ी के कारख़ाने के मालिक ने बयान किया है। कहानी के रावी (कथावाचक) कहते हैं: मैं एक दर्ज़ी के कारख़ाने का मालिक था। मेरी एक पड़ोसन थी जिसका शौहर (पति) फौत हो चुका था और उसने अपने पीछे तीन यतीम (अनाथ) बच्चे छोड़े थे। एक दिन वह मेरे कारख़ाने में आई और कहने लगी: "ऐ फ़लाँ (भाई), मेरे पास एक सिलाई मशीन है जिस पर मेरे शौहर काम करते थे और हम इस पर काम करना नहीं जानते। मैं चाहती हूँ कि इन यतीम बच्चों की किफ़ालत (परवरिश) करूँ, क्या मैं इस मशीन को आपके कारख़ाने में लाकर आपको किराए पर दे सकती हूँ ताकि मुझे कुछ आमदनी हो और मैं अपने ख़ानदान का पेट पाल सकूँ?" मैं उसकी बात सुनकर शर्मिंदा (संकोच व दया से भावुक) हो गया (और शर्म कभी भी बुराई की तरफ़ नहीं ले जाती)।ने कहा: "बहन, बिल्कुल! आप इसे मेरे पास भेज दें।" जब उसने मशीन लाई तो मैंने देखा कि वह बहुत पुराना मॉडल था और किसी काम का नहीं था। लेकिन मैं उस औरत का दिल नहीं तोड़ना चाहता था। मैंने उससे पूछा: "बहन, आप इस मशीन का किराया क्या लेना चाहती हैं?" उसने कहा: "तीन हज़ार लीरा"... और यह वाक़या (घटना) जंग (युद्ध) से बीस साल पहले का है। मैंने उसे तीन हज़ार लीरा दिए और मशीन को एक कोने में रख दिया क्योंकि वह किसी काम की नहीं थी। लेकिन मैंने उसका दिल नहीं तोड़ा। हम दस साल तक इसी हालत में रहे। हर महीने उम्मे जमील आती और मशीन का किराया ले जाती, जबकि मशीन कारख़ाने के एक कोने में पड़ी रहती और कोई काम नहीं करती थी। दस साल बाद, हमने छोटे कारख़ाने से एक नए कारख़ाने में ट्रांसफर किया जो क़स्बे के किनारे पर था। जब हम सामान शिफ्ट कर रहे थे तो मैंने कहा: "उम्मे जमील की मशीन भी ले जाओ।" कारख़ाने की मैनेजर ने कहा: "सर, हमें उम्मे जमील की मशीन की क्या ज़रूरत है? क्यों इसे ले जाएँ?" ने कहा: "यह पूछना तुम्हारा काम नहीं, बस इसे ले जाओ।" दिन और साल गुज़रते गए। फिर जंग शुरू हो गई। और ख़ुदा की क़सम, उस इलाक़े में सब कुछ तबाह हो गया सिवाय मेरे कारख़ाने के। जंग की वजह से, उम्मे जमील से राब्ता (सम्पर्क) टूट गया। हमने बहुत कोशिश की मगर उसका कोई पता नहीं चला। हर बार जब हम उसके नंबर पर फ़ोन करते तो वह बंद आता। मेरे कारख़ाने की मैनेजर मुझे छोड़कर यूरोप चली गई। दो महीने बाद, उसने मुझे फ़ोन किया और कहा: "मैंने एक ख़्वाब (सपना) देखा है जनाब और मैं चाहती हूँ कि आप इसे सुनें।" मैंने पूछा: "वह क्या ख़्वाब है?" उसने कहा: "मैंने ख़्वाब में सुना कि एक आवाज़ कह रही थी: 'फ़लाँ को कहो कि उम्मे जमील की मशीन की बरकत से हमने तुम्हारे कारख़ाने को इस जंग में महफ़ूज़ (सुरक्षित) रखा।'" कहानी का रावी कहता है: "मेरी रूह (त्वचा) काँप गई और आँखों में आँसू आ गए। मैंने कहा: 'अल्हम्दुलिल्लाह'। और ख़ुदा की क़सम, मेरे कारख़ाने से एक सुई भी ग़ायब नहीं हुई, हालाँकि उस इलाक़े में सब कुछ तबाह व बर्बाद हो गया था।" 🎯 सबक़ (नसीहत): नेकी के काम हर बुराई और नुक़सान से बचाते हैं। जैसा कि अल्लाह सुब्हानहू व तआला ने सच्चा वादा फ़रमाया है: इन्नल्लज़ीन आमनू व अमिलुस्सालिहाति इन्ना ला नुज़ीउ अज्र मन अहसन अमला (सूरा अल-कहफ़: आयत 30) बेशक जो लोग ईमlन लाए और नेक अमल किए, तो यक़ीनन हम नेकोकार (भलाई करने वाले) लोगों का अज्र (प्रतिफल) ज़ाया (व्यर्थ) नहीं किया करते।

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