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"ख़ुदा की क़सम! अगर आप अहल-ए-ग़ज़ा (ग़ज़ा वासियों) पर ढाए जाने वाले मज़ालिम (अत्याचार) और तकलीफ़ें देखें तो आप दंग रह जाएं, ज़ेहन इस बात को स्वीकार नहीं कर पाएगा कि आख़िर एक इंसान इन तमाम मज़ालिम और तकलीफ़ों को बर्दाश्त करके ज़िंदा कैसे रह सकता है? और इन तकलीफ़ों की शिद्दत (तीव्रता) से उसकी मौत कैसे वाक़े नहीं हुई?!! ख़ुदा की क़सम! अगर ये तकलीफ़ें और मशक़्क़तें किसी चट्टान पर गुज़रतीं तो वह तकलीफ़ की शिद्दत से फट जाती, समंदर पर इतना ज़ुल्म ढाए जाता तो वह बुख़ारात (भाप) बन जाता, दीव-हैमल (विशालकाय) पहाड़ों पर अगर इतना सितम ढाए जाता तो उनमें शगाफ़ (दरारें) पड़ जाते, लोहे जैसी मज़बूत धातु तक इस तकलीफ़ की शिद्दत से पिघल जाती!! हमने जो आफ़तें देखी हैं उसके मुक़ाबले में आपकी परेशानियाँ हेच (तुच्छ) हैं, (बा-ख़ुदा यह हक़ीक़त है) , हम पर बीतने वाले दिलसोज़ (दिल दहला देने वाले) मन्ज़िरों के आदी न बनें, इसे हमारी आदी ज़िंदगी / रूटीन लाइफ़ न समझें , बिला-शुब्हा हमें तन्हा, बे-यार-ओ-मददगार छोड़ने वालों को अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त देख रहे हैं, और उन सब को अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त के हुज़ूर जवाबदेह होना है।" - अनुवादक: अब्दुल रहमान फ़ज़ल।
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