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घर से बाहर निकलते ही आपका दो प्रकार की महिलाओं से सामना होता है। पहली प्रकार: उन महिलाओं की है जो अज़ीज़-ए-मिस्र की पत्नी जैसी बीमारी का शिकार हैं। खूब बन-संवर कर, परफ्यूम लगाए, बेपर्दा... अपनी ज़बान-ए-हाल (व्यवहार) से कह रही होती हैं ” هَيْتَ لَكَ ” (आ जाओ)। दूसरी प्रकार: वह महिला जो सतर और हिजाब (पर्दे) की पाबंद है, लेकिन मजबूरी ने उसे घर से निकाला। वह अपनी ज़बान-ए-हाल से कह रही होती है ”حَتَّى يُصْدِرَ الرِّعَاءُ وَأَبُونَا شَيْخٌ كَبِيرٌ ” (जब तक चरवाहे अपने जानवर न हटा लें, और हमारे पिता बहुत बूढ़े हैं)। पहली प्रकार की महिलाओं से आप वही मामला (व्यवहार) करें जो सैय्यदना यूसुफ अलैहिस्सलाम ने किया था, यानी कहें ” مَعَاذَ اللَّهِ ” (अल्लाह की पनाह)। और दूसरी प्रकार की महिलाओं से आप वही मामला करें जो सैय्यदना मूसा अलैहिस्सलाम ने किया था, यानी अदब व एहतराम (आदर-सम्मान) से उनकी मदद करें और अपने काम में व्यस्त हो जाएं और अल्लाह का फरमान: ” فَسَقَىٰ لَهُمَا ثُمَّ تَوَلَّىٰ إِلَى الظِّلِّ ” (तो उसने उन दोनों के लिए पानी पिलाया, फिर छांव की तरफ लौट आया) याद करें। क्योंकि यूसुफ अलैहिस्सलाम अपनी इफ्फत व पाकदामनी (पवित्रता और शील) के कारण अज़ीज़-ए-मिस्र बन गए थे। और मूसा अलैहिस्सलाम के हुस्न-ए-तामुल (बेहतरीन व्यवहार) के कारण अल्लाह ने उन्हें एक नेक पत्नी और शांतिपूर्ण निवास स्थान प्रदान किया।
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