पैदल चलते हुए मुताला (अध्ययन)

पैदल चलते हुए मुताला (अध्ययन)

अस्लाफ़ (पूर्वजों) के यहाँ शौक़-ए-मुताला (अध्ययन का शौक़) और समय के महत्व का यह आलम था कि पैदल चलते हुए भी किताब का मुताला जारी रहता। इब्न अल-आबनूसी कहते हैं कि अल्लामा ख़तीब बग़दादी ؒ पैदल चल रहे होते तो हाथ में किताब लिए उसका मुताला कर रहे होते। (सियर अलाम अन-नुबला, 18: 281) नह्व (व्याकरण) के एक बेबदल आलिम (अद्वितीय विद्वान) अल्लामा अहमद bin यह्या, जो थअलब के नाम से मशहूर हैं, उनको तो यह शौक़ बहुत ही महँगा पड़ा। यह मुताले के रसिया थे और सक़्ल-ए-समाअत (ऊँचा सुनने) का शिकार थे, इसलिए ऊँचा सुनाई देता था। एक मर्तबा जुमे के दिन अस्र पढ़कर जामे मस्जिद से निकले तो हस्ब-ए-मामूल (हमेशा की तरह) किताब खोली और पैदल चलते हुए पढ़ने में मग्न हो गए। रास्ते में घोड़े ने दुलत्ती झाड़ दी; पास ही एक गहरा खड्डा था, यह उसमें जा गिरे। उनको दिमाग़ पे चोट आई; इसी हाल में घर ले जाया गया मगर अगले रोज़ यह आशिक़-ए-कुतुब (किताबों के प्रेमी) इंतक़ाल कर गए! (इब्न ख़ल्लिकान, वफ़यात अल-अयान, 1: 104) [इंतख़ाब व तर्जुमानी (चयन एवं अनुवाद): ताहेर इस्लाम असकरी]

सबसे हालिया

Naats