वहदत-ए-दीन न कि वहदत-ए-अदयान (दीन की एकता, न कि धर्मों की एकता)

वहदत-ए-दीन न कि वहदत-ए-अदयान (दीन की एकता, न कि धर्मों की एकता)

🖋 मौलाना ख़ालिद सैफ़ुल्लाह रहमानी - शम्अ-ए-फ़रोज़ां 🕯 अल्लाह तआला ने हर चीज़ के लिए एक रास्ता बनाया है, इसी रास्ते से उस चीज़ को हासिल करने में इंसान की भलाई है और इस रास्ते को छोड़ देने में और अपनी तरफ़ से नए रास्ते बनाने में इंसान की बर्बादी है। अल्लाह तआला ने ग़िज़ा (भोजन) को पेट तक पहुँचाने के लिए मुँह का रास्ता रखा है और उसी के लिहाज़ से जिस्मानी (शारीरिक) निज़ाम बनाया गया है। जब इंसान कोई लुक़्मा (कौर) अपने मुँह में रखता है तो ख़ुद-ब-ख़ुद मुँह में लुआब (लार) पैदा होता है, और यह लुआब खाने के साथ मिलकर उसको मैदे (पेट/आमाशय) तक पहुँचाने के क़ाबिल बनाता है, फिर मैदा उसे पीसता है, जो अज्ज़ा (तत्व) इंसान के लिए कारआमद (उपयोगी) हैं, उनको जज्ब (अवशोषित) करता है और जो बेफ़ायदा हैं, उन्हें एक मुक़र्रर रास्ते से बाहर फेंक देता है। अगर इंसान सिर्फ़ खाने और हज़्म होने के इस निज़ाम पर ग़ौर कर ले तो ख़ुदा के वजूद पर ईमान लाने के लिए काफ़ी है। सांस की नाली के ज़रिए ऑक्सीजन जिस्म के अंदर जाती है और फेफड़े तक पहुँचती है, इससे इंसान का पूरा निज़ाम चलता है। अगर कोई शख़्स खाने की नाली के बजाय ग़िज़ा को नाक में डाल दे, या कोई लुक़्मा सांस की नाली में डाल दे तो ज़िंदगी ख़तरे में पड़ जाएगी; जिस सांस के ज़रिए ज़िंदगी क़ायम रहती है और जिस ग़िज़ा से इंसान का वजूद है, वही उसके लिए हलाकत (तबाही) का सबब बन जाएगी। इसी तरह एक रास्ता वह है, जो इंसान को इस दुनिया से आख़िरत की कामयाबी की तरफ़ ले जाता है, अल्लाह तआला ने अपने पैग़ंबरों के ज़रिए इस रास्ते की रहनुमाई (मार्गदर्शन) की है और इसे खोल-खोल कर इंसानियत के सामने पेश किया है, इसी रास्ते को इस्लाम कहा गया है: "इन्नद-दीन इन्दल्लाहिल इस्लाम" (आले इमरान: 19) इस्लाम के मायने सर झुका देने के हैं, यानी ऐसा तरीक़ा-ए-ज़िंदगी जिसमें इंसान एक अल्लाह के सामने सरे-तस्लीम ख़म कर देता है (सिर झुका देता है), उसकी रज़ा के मुक़ाबले में अपनी ख़्वाहिशात को भूल जाता है, यही तरीक़ा अल्लाह के यहाँ मक़बूल (स्वीकार्य) है, इससे हटकर कोई और तरीक़ा अल्लाह की बारगाह में क़ाबिले-क़बूल नहीं; चुनाँचे अल्लाह तआला का इरशाद है: "वमंय यब्तग़ि ग़ैरल् इस्लामि दीनन फ़लंय युक़्बला मिन्हु वहुवा फ़िल आख़िरति मिनल ख़ासिरून" (आले इमरान: 85) यह दीन जो अल्लाह तआला ने भेजा है, इंसान की कामयाबी और नजात (मुक्ति) इसी में है, इसके अलावा इंसान कोई भी रास्ता इख़्तियार करे, वह उसके लिए नुक़सान और नाकामी का रास्ता है। अगरचे (यद्यपि) इस्लाम का आख़िरी रूप जो क़ियामत तक क़ायम रहेगा, वही है जिसे हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के बाद मुहम्मद रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम लेकर आए; लेकिन इस्लाम इस इंसानी कायनात में पहले दिन से रसूलों के ज़रिए आता रहा है। हज़रत आदम पहले इंसान भी थे और पैग़ंबर भी, फिर तमाम नबियों और रसूलों ने इसी दीन की दावत दी: "व वस्सा बिहा इब्राहीमु बनीहि व यअक़ूबु या बनिय्या इन्नन्नाहास्तफ़ा लकुमुद्दीन फ़ला तमूतुन्ना इल्ला व अन्तुम मुस्लिमून" (अल-बक़रह: 132) "अम कुन्तुम शुहदा-अ इज़ हज़रा यअक़ूबल मौतु इज़ क़ाला लिबनीहि मा तअबुदूना मिम बअदी क़ालू नअबुदु इलाहका व इलाहा आबाइका इब्राहीमा व इस्माईला व इस्हाक़ा इलाहंव वाहिदंव व नहनु लहू मुस्लिमून" (अल-बक़रह: 133) "और इब्राहीम ने अपने बेटों को इसी की वसीयत की और यअक़ूब ने भी (कि) ऐ मेरे बेटो! बेशक अल्लाह ने तुम्हारे लिए इस दीन को पसंद फ़रमा लिया है; इसलिए तुम्हें इस्लाम ही की हालत में मौत आनी चाहिए।" "क्या तुम उस वक़्त मौजूद थे जब यअक़ूब का आख़िरी वक़्त आया, उस वक़्त यअक़ूब ने अपने बेटों से कहा: तुम मेरे बाद किसकी इबादत करोगे? उन्होंने जवाब दिया: हम आपके ख़ुदा, आपके बाप-दादा इब्राहीम, इस्माईल और इस्हाक़ के ख़ुदा यानी एक ही ख़ुदा की इबादत करेंगे और हम उसी के फ़रमांबरदार (आज्ञाकारी) रहेंगे।" इस दीने-हक़ की आख़िरी और मुकम्मल (पूर्ण) शक्ल वह है, जो मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के ज़रिए इंसानियत तक पहुँची। पिछली किताबों में जो तहरीफ़ (बदलाव) और मिलावट पैदा कर दी गई थी, क़ुरआन मजीद के ज़रिए उनको दूर किया गया। पिछली शरीअतों के कुछ अहकाम मन्सूख़ (रद्द) कर दिए गए थे; इसलिए एक ऐसी किताब की ज़रूरत थी, जिसमें मन्सूख़ और तहरीफ़-शुदा अहकाम न हों, यह ज़रूरत क़ुरआन मजीद के ज़रिए पूरी की गई। यूँ तो आपसे पहले भी हर दौर में अल्लाह के नबी आते रहे और बाज़ दफ़ा ऐसा भी हुआ है कि एक ही वक़्त में मुख़्तलिफ़ (विभिन्न) इलाक़ों के लिए अलग-अलग पैग़ंबर भेजे गए, जो अपने मुख़ातब (संबोधित लोगों) की ज़बान से वाक़िफ़ थे, और उसी ज़बान में उन पर आसमानी किताब नाज़िल की गई; लेकिन सैय्यदिना हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम को यह इम्तियाज़ (विशेषता) हासिल है कि उनके बाद जो भी पैग़ंबर पैदा हुए, वह उन्हीं की नस्ल से पैदा हुए। उनके दो साहबज़ादे थे: सैय्यदिना हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम, जिनकी वालिदा मिस्त्र की रहने वाली ख़ातून हज़रत हाजरा अलैहिस्सलाम थीं, उनकी नस्ल से मुहम्मद अरबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पैदा हुए; दूसरे: सैय्यदिना हज़रत इस्हाक़ अलैहिस्सलाम, जिनकी वालिदा हज़रत सारा अलैहिस्सलाम थीं, तमाम अम्बिया-ए-बनी इस्राईल हज़रत इस्हाक़ अलैहिस्सलाम की नस्ल से थे। हिजाज़-ए-मुक़द्दस और उसके क़ल्ब (हृदय) में आबाद मक्का मुकर्रमा में का'बतुल्लाह की तामीर (निर्माण) हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने अपने साहबज़ादे हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम के साथ मिलकर फ़रमाई, जहाँ पूरी दुनिया के मुसलमान फ़रीज़ा-ए-हज अदा करने के लिए जाते हैं, और हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ही ने फ़िलिस्तीन के शहर बैतुल मुक़द्दस में भी इबादतगाह तामीर की, जो आज "मस्जिद-ए-अक़्सा" कहलाती है। अम्बिया-ए-बनी इस्राईल की एक बड़ी तादाद है; लेकिन जिन पैग़ंबरों से मन्सूब (संबंधित) क़ौमों आज तक मौजूद हैं और दुनिया में आबाद हैं, वह सैय्यदिना हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम और सैय्यदिना हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम हैं। हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को मानने वाले यहूदी कहलाए और हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के मानने वाले ईसाई। इस तरह दुनिया के तीन बड़े मज़हबी गिरोह: मुसलमान, यहूद और ईसाई, हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम से निस्बत (संबंध) रखते हैं। हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की बुनियादी तालीम तौहीद (एकेश्वरवाद) की थी; मगर यहूदियों और ईसाइयों ने तहरीफ़ (बदलाव) और आमीज़िश (मिलावट) पैदा कर दी; इसलिए आज हज़रत मूसा और हज़रत ईसा अलैहिमुस्सलाम की तालीमात म्सख़-शुदा (विकृत) और तहरीफ़-शुदा हालत में हैं, और जो कुछ हैं, उन पर भी इन क़ौमों का अमल नहीं है, न उनके ख़्वास (विशिष्ट लोगों) का न अवाम (आम लोगों) का। सैय्यदिना इब्राहीम और तमाम अम्बिया की बुनियादी तालीम अक़ीदा-ए-तौहीद पर मबनी (आधारित) थी। आज भी तौराह में, यहाँ तक कि ख़ुद इंजील में भी तौहीद से मुताल्लिक़ वाज़ेह (स्पष्ट) मजामीन मौजूद हैं, जिनमें बहुत ख़ूबसूरती के साथ अल्लाह तआला की ज़ात और सिफ़ात का तआरुफ़ (परिचय) कराया गया है। जैसे किसी सामान में मिलावट पैदा करने के बाद उस सामान के कुछ न कुछ अज्ज़ा (अंश) उसमें बाक़ी रह जाते हैं—ऐसा नहीं होता कि चावल में मिलावट की वजह से वह मिट्टी बन जाए, और गेहूँ में मिलावट की वजह से वह पत्थर बन जाए—इसी तरह तौरात व इंजील में ढेर सारी तहरीफ़ात के बावजूद दीने-हक़ की सच्चाइयों के ज़र्रात भी मौजूद हैं; अक़ीदा-ए-तौहीद भी है, रिसालत और वह्य और आसमानी किताब का तसव्वुर भी है, जन्नत और दोज़ख़ का भी तद्किरा है, हलाल व हराम के अहकाम भी हैं; लेकिन इन क़ौमों ने इस दीन को पस-ए-पुश्त डाल दिया (पीछे छोड़ दिया), इसका नतीजा है कि उनके मुख़्तलिफ़ फ़िरक़ों में मुश्रिकाना रसूम व रिवाज भी आ गए, मुल्हिद (नास्तिक) और दहरिए भी यहूदी और ईसाई कहलाने लगे। उन्होंने अल्लाह की शरीअत के बजाय अपनी ख़्वाहिश और शहवत को अपनी शरीअत बना लिया। ग़रज़ कि यहूदी और ईसाई दीने-इब्राहीमी के रास्ते से हट चुके हैं और अहकाम-ए-इलाही से आज़ाद हो चुके हैं, सिर्फ़ उम्मते-मुस्लिमा अपनी बहुत सी कमियों और कोताहियों के बावजूद दीने-इब्राहीमी पर क़ायम है। अब इस वक़्त मग्रिबी (पश्चिमी) दुनिया की तरफ़ से मुसलमानों को राहे-हक़ से हटाने के लिए "इब्राहीमिया" के नाम से एक नया फ़ित्ना पैदा करने की कोशिश की जा रही है, जिसको इस तसव्वुर (धारणा) के साथ पेश किया जा रही है कि इस्लाम, यहूदियत और ईसाइयों के दरमियान क़ुर्बत (नज़दीकी) पैदा की जाए और इसके लिए ऐसे मराकिज़ (केंद्र) क़ायम किए जाएँ, जिनमें मस्जिद, चर्च और यहूदी इबादतगाह एक ही अहाते में हों। मग्रिबी क़ूवतें इस्लाम को यहूदियत और ईसाइयत में ज़म (विलय) करने के लिए इस इस्तलाह (शब्दावली) का इस्तेमाल कर रही हैं। जब 1979 में मिस्र और इस्रायल के दरमियान "कैंप डेविड" मुआहदा (समझौता) हुआ, जिसका मुहर्रिक (प्रेरक) अमेरिका था, तो अमेरिकी सदर जिमी कार्टर ने कहा कि "आइए हम जंग को एक तरफ़ रख दें और हम इब्राहीम के तमाम प्यासे बेटों के लिए अमन का एक मुआहदा करें; ताकि मुकम्मल इंसान हमसाए (पड़ोसी); बल्कि मुकम्मल भाई-बहन बन जाएँ।" फिर 1993 में ओस्लो मुआहदा हुआ, उस वक़्त एक और अमेरिकी सदर क्लिंटन ने कहा: "आज इस बहादुरी के सफ़र में हम इब्राहीम के बेटे इस्हाक़ और इस्माईल के साथ मिलकर अमन को अपने दिल व जान से पेश कर रहे हैं।" फिर 1994 में जब इस्रायल और उर्दुन (जॉर्डन) के दरमियान मुआहदा हुआ तो उस मौक़े पर उर्दुन के शाह हुसैन ने कहा: "आज के दिन को हम और हमारी नस्लें इब्राहीम के बेटों की हैसियत से याद रखेंगी।" इस्लाम में "इब्राहीमिया" के नाम से या किसी और नाम से मुख़्तलिफ़ मज़ाहिब के माजून-ए-मुरक्कब (मिश्रण) और मलगोभा (खिचड़ी) का कोई तसव्वुर नहीं है; मगर अफ़सोस कि अरब क़ाइदीन (नेताओं) ने अपनी ना-अहलियत और ना-समझती की वजह से इस तसव्वुर को क़बूल करने में अहमक़ाना (मूर्खतापूर्ण) पेशक़दमी की है। मिस्र के साबिक़ (पूर्व) सदर अनवर अस्सादात ने इसी जज्बे के तहत सीना (सिनाई) के इलाक़े में "मज्मअ-उल-अद्यान" (धर्मों का संगम) बनाने का फ़ैसला किया था। यह इस्तलाह उस वक़्त और ज़्यादा मशहूर हुई और आलमी (वैश्विक) सतह पर इसका आवाज़ा बुलंद होने लगा, जब 2020 में अमेरिका की ज़ेरे-सरपरस्ती अरब इमारात और बहरीन की तरफ़ से इस्रायल के साथ दोस्ताना तअल्लुक़ात क़ायम करने की बात सामने आई और सितंबर 2020 में व्हाइट हाउस में उस मुआहदे पर दस्तख़त हुए, जिसको अमेरिकी सदर ट्रम्प ने "अब्राहम एकॉर्ड" (इब्राहमी समझौता) का नाम दिया, और इसी का एक मज्हर (प्रतीक) यह कि अरब इमारात की राजधानी अबू धाबी में "इब्राहीमिया हाउस" का इफ़्तिताह (उद्घाटन) हुआ, जिसमें मस्जिद, चर्च और यहूदी इबादतगाहें इकट्ठे तौर पर बनाई गईं। मग्रिब में एक ख़ास साज़िश के तहत यह ख़िलाफ़-ए-वाक़िया (तथ्यहीन) और नाक़ाबिल-ए-क़बूल तसव्वुर पेश किया गया है और अफ़सोस कि आलमे-अरब ने अपनी बेबसी, नाफ़हमी और मग्रिब की ख़ुशामद में इस इस्तलाह को क़बूल करने का आग़ाज़ (शुरुआत) कर दिया है। यह दरअसल वहदत-ए-अद्यान (धर्मों की एकता) की एक आलमी (वैश्विक) कोशिश है, इसकी इब्तिदा (शुरुआत) तो हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की तरफ़ मन्सूब तीन क़ौमों से हुई है; लेकिन अंदेशा है कि बतदरीज (धीरे-धीरे) इसमें दीगर बड़े मज़ाहिब ख़ासकर हिन्दू और बौद्ध धर्मों को भी शामिल कर लिया जाए। "मज़हब" बुनियादी तौर पर तीन अनासिर (तत्वों) को शामिल होता है: अक़ीदा, शरीअत और अख़लाक़। अख़लाक़ी (नैतिक) तालीमात तमाम ही मज़ाहिब में मिलती-जुलती हैं; हर मज़हब में दूसरों के साथ हुस्ने-सुलूक (अच्छा व्यवहार), बड़ों का अदब-एहतेराम, छोटों के साथ शफ़क़त (स्नेह), माँ-बाप की ख़िदमत, पड़ोसियों के साथ बेहतर सुलूक, इसी तरह सफ़ाई-सुथराई की तालीम दी गई है; अलबत्ता इस सिलसिले में इस्लाम का इम्तियाज़ (विशिष्टता) यह है कि उसने अख़लाक़ी तालीम को पूरे एक निज़ाम (व्यवस्था) की学 की शक्ल में पेश किया है; ताकि लोगों के लिए इस पर अमल करना आसान हो जाए। जैसे रिश्तेदारों के साथ हुस्ने-सुलूक, मज़ाहिब की एक मुश्तरका (साझा) तालीम है; लेकिन इस्लाम ने नफ़क़ा (भरण-पोषण) और वरासत (उत्तराधिकार) का क़ानून और मुख़्तलिफ़ रिश्तेदारों के हुक़ूक़ मुतअय्यन (तय) करके इसकी मुतअय्यन सूरत मुक़र्रर कर दी है। सफ़ाई-सुथराई को हर मज़हब में पसंद किया गया है; लेकिन इस्लाम ने इसके लिए इस्तिन्जा, वज़ू, ग़ुस्ल, नमाज़ अदा करने के लिए लिबास और जगह की सफ़ाई के तफ़्सीली (विस्तृत) अहकाम दिए हैं। अख़लाक़ी पहलुओं को जब क़ानून के दायरे में ले आया जाता है, तो उन पर अमल आसान हो जाता है और हर शख़्स उनकी पाबंदी करने पर मजबूर होता है। अक़ीदे के मामले में इस्लाम मुकम्मल तौर पर अक़ीदा-ए-तौहीद का दाई (प्रचारक) है, और मुसलमान होने के लिए तौहीद का इक़्रार काफ़ी नहीं है; बल्कि शिर्क से बराअत (अलग होने) का इज़हार भी ज़रूरी है; इसलिए हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया: "इन्नी बरीउम मिम्मा तुश्रिकून" (अनआम: 78) अब ग़ौर किया जाए कि जो मज़हब एक ख़ुदा को मानता है और जिस मज़हब में तीन-तीन ख़ुदा माने गए हों, या ख़ुदा के इख़्तियारात (अधिकार) बंदों के हाथ में दे दिए गए हों, या जिसमें ख़ुदा की मख़्लूक़ (सृष्टि) को यहाँ तक कि इंसान से कम दर्जे की मख़्लूक़ को भी ख़ुदा क़रार दिया गया हो, वह कैसे एक हो सकते हैं? जहाँ तक शरीअत की बात है तो इस्लाम में हलाल व हराम, पसंदीदा और नापसंदीदा अफ़आल (कर्मों) की एक पूरी फ़ेहरिस्त है; जो उमूर (मामले) जाइज़ हैं उनमें कोई फ़र्ज़ है और कोई वाजि़ब, जो उमूर ना-जाइज़ हैं, उनमें कोई हराम है और कोई मकरूह। जबकि मौजूदा यहूदियत और ईसाइयत ने अपने आप को शरीअत के अहकाम से पूरी तरह आज़ाद कर लिया है। "सूद" (ब्याज) को यहूदियत और ईसाइयत में भी हराम क़रार दिया गया है; मगर आज पूरी मग्रिबी दुनिया सूद और क़िमार (जुए) में न सिर्फ़ मुब्तला (ग्रस्त) है बल्कि इसकी दाई (समर्थक) है। ज़िना (व्यभिचार) के हराम होने पर तौरात और क़ुरआन मजीद दोनों का इत्तेफ़ाक़ (सहमति) है; लेकिन आज ईसाई दुनिया में ज़िना की हुरमत (निषेध) का कोई तसव्वुर नहीं, बल्कि ऐसे ख़यालात को दक़ियानूसीयत (पिछड़ापन) समझा जाता है, तो ऐसे मज़ाहिब को एक कैसे बनाया जा सकता है? यह एक ग़ैर-हक़ीक़तपसंदानी (अवास्तविक) बात है। यह ऐसा ही है जैसे एक ही रंग सुर्ख़ (लाल) भी कहलाए और सफ़ेद भी, यह कैसे मुमकिन है? इसलिए वहदत-ए-अद्यान या मग्रिब के नाम-निहाद (कथित) मज़हब "इब्राहीमिया" दीने-हक़ को हक़ानियत (सच्चाई) से महरूम करने की एक गहरी और शातिराना साज़िश तो हो सकती है; लेकिन किसी भी साहिबे-अक़्ल (बुद्धिमान व्यक्ति) के लिए क़ाबिले-क़बूल नहीं हो सकती। दीने-हक़ को उसकी सच्चाई से महरूम करने के लिए ऐसी कोशिशें हमेशा से होती रही हैं। जब अहल-ए-मक्का (मक्का वालों) ने इस्लाम के नन्हे-मुन्ने पौधे को उखाड़ने की हज़ार कोशिशें कीं और नाक़ाम व नामरा द रहे, तो उन्होंने हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से एक मिले-जुले मज़हब को मानने की पेशकश की कि हम भी आपके ख़ुदा की इबादत कर लें और आप भी हमारे बुतों की पूजा में शामिल हो जाएँ; लेकिन क़ुरआन मजीद ने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के ज़रिए साफ़ ऐलान करवा दिया कि मैं तुम्हारे बातिल (झूठे) माबूदों की इबादत नहीं कर सकता: "ला अअबुदु मा ताबुदून" (अल-काफ़िरून: 2)। इसी तरह मुसैलमा कज़्ज़ाब ने नबुव्वत का झूठा दावा किया, उसने अपने मुत्तबीईन (अनुयायियों) की एक बड़ी जमात तैयार कर ली और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को कहलाया कि हम लोग नबुव्वत को आपस में तक़्सीम (विभाजित) कर लें—आधे लोग आपको नबी तस्लीम करें और आधे मुझे। जब आपने सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इसको मुस्तरद (खारिज) फ़रमा दिया तो जंग-ए-यमामा का वाक़िया पेश आया, जिसमें बारह हज़ार सहाबा (रज़ि.) शहीद हुए, जिनमें सात सौ हाफ़िज़-ए-क़ुरआन थे। इसी हादसे के बाद हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ रज़ियल्लाहु तआला अन्हु के अंदर क़ुरआन मजीद को जमा (संकलित) करने का ख़याल पैदा हुआ, जबकि अहदे-नबवी के तमाम ग़ज़वात (युद्धों) में शहीद होने वाले मुसलमानों की मज्मूई (कुल) तादाद 255 से ज़्यादा नहीं है। इस तरह की कोशिशें कई बार की गई हैं, जिनमें मुग़ल दौर में अकबर के "दीन-ए-इलाही" ने भी बहुत शोहरत हासिल की। अकबर चाहता था कि इस्लाम और हिन्दू धर्म को मिलाकर एक मिला-जुला मज़हब तश्कील (बनाया) दिया जाए, इसके लिए उसने कुछ गुमराह नाम-निहाद मुसलमान मौलवियों और हिन्दू मज़हब के जानकारों से मदद हासिल की, और इस नए मज़हब को "दीन-ए-इलाही" का नाम दिया। शेख़ अहमद सरहिंदी (रह.) ने इसके ख़िलाफ़ सख़्त मुज़ाहमत (प्रतिरोध) की, जेल की सोअूबतें (कठिनाइयाँ) भी बर्दाश्त कीं, अपनी ज़िंदगी को ख़तरे में डाला और इस साज़िश को नाक़ाम बनाया; यही उनका सबसे बड़ा तज्दीदी (सुधारात्मक) काम था, जिसकी वजह से वह "मुजद्दिद अल्फ़-ए-सानी" कहलाए। बाद में भी ख़ासकर 1947 से पहले और उसके बाद कुछ क़ाइदीन (नेताओं) की तरफ़ से इस तरह की बातें कही गईं और ख़्वाहिश की गई कि मुसलमान हिन्दू मज़हब के कुछ नज़रियात (विचारों) को क़बूल कर लें, और बिरादरान-ए-वतन (देशवासी) इस्लाम की कुछ हक़ीक़तों को क़बूल कर लें। ज़ाहिर है यह बात मुसलमानों के लिए क़ाबिले-क़बूल नहीं थी, दोनों मज़ाहिब के दरमियान इतना तज़ाद (विरोधाभास) है कि हिन्दू मज़हबी क़ाइदीन के लिए भी इसको क़बूल करना मुमकिन नहीं था; चुनाँचे अगरचे एकादश (इक्के-दुक्के) लोगों ने इस नज़रिया की ताईद (समर्थन) की, यहाँ तक कि 1947 से पहले जो आख़िरी मर्दुमशुमारी (जनगणना) हुई, उसमें कुछ हज़रात ने मज़हब के ख़ाने में अपने लिए "मुहम्मदी हिन्दू" की ताबीर (शब्द) इस्तेमाल की; लेकिन इस तसव्वुर को फ़रोग़ (बढ़ावा) हासिल नहीं हो सका। अगर इस कोशिश का मक़सद अहल-ए-मज़ाहिब (धर्मावलंबियों) के दरमियान इत्तेफ़ाक़ और रवादारी (सहिष्णुता) का माहौल पैदा करना हो तो इसका रास्ता वह है, जो क़ुरआन मजीद ने बताया है कि हर क़ौम अपने मज़हबी तसव्वुरात और मज़हबी अहकाम पर क़ायम रहे, और जैसे वह ख़ुद अपने मज़हब पर अमल करे, दूसरे अहल-ए-मज़ाहिब के लिए भी इस हक़ को तस्लीम (स्वीकार) करे कि वे भी अपने मज़हब के मुताबिक़ अक़ीदा रखें और अपने मज़हब के मुक़र्रर किए हुए क़ानून-ए-ज़िंदगी पर अमल करें; क़ुरआन करीम के अलफ़ाज़ में: "लकुम दीनुकुम वलिय दीन" (अल-काफ़िरून: 6)। बाहम (परस्पर) अख़ूवत (भाईचारे) और अमन व अमान का हल यही है कि हर आदमी अपने मज़हब पर अमल करे और दूसरे के साथ बेहतर सुलूक करे, हर एक की जान व माल, इज़्ज़त व आबरू, मज़हबी जज़्बात का एहतेराम (आदर) किया जाए। क़ुरआन मजीद में बारहा इन हुक़ूक़ को खोल-खोल कर बयान फ़रमाया गया है और रवादारी, तहम्मुल (धैर्य) और हुस्ने-सुलूक की दावत दी गई है। मुसलमानों को ऐसे फ़ित्नों के बारे में बा-शऊर (जागरूक) रहना चाहिए और ऐसे दाम (जाल) में आने से ख़ुद को महफ़ूज़ रखना चाहिए; अल्लाह तआला इस फ़ित्ने से आलमे-इस्लाम (इस्लामी जगत) की भी हिफ़ाज़त फ़रमाए और पूरी दुनिया के मुसलमानों की भी। ____📝📝📝____ मनक़ूल। चयन: इस्लामिक ट्यूब प्रो ऐप।

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