मतभेदों के बावजूद बेमिसाल इत्तिहाद – क़ैसर-ए-रोम को एक ऐतिहासिक जवाब

मतभेदों के बावजूद बेमिसाल इत्तिहाद – क़ैसर-ए-रोम को एक ऐतिहासिक जवाब

हज़रात-ए-सहाबा-ए-किराम (रज़ियल्लाहु अन्हुम) में कुछ मसलों पर मतभेद (इख़्तिलाफ़) रहा है; मगर एक-दूसरे के सम्मान (एहतराम) में कभी फ़र्क़ नहीं आया। कौन नहीं जानता कि ख़ून-ए-उस्मान (रज़ियल्लाहु अन्हु) के मसले पर सहाबा-ए-किराम में शदीद (गंभीर) मतभेद हुआ और इसकी वजह से जंग भी हुई; मगर क्या मजाल कि उनके इस मतभेद से एक-दूसरे के सम्मान में फ़र्क़ आ जाए। चुनांचे, ऐन जंग के मौक़े पर हज़रत अमीर मुआविया (रज़ियल्लाहु अन्हु) को रोम की ईसाई सल्तनत की तरफ़ से, जिसका सरबराह (प्रमुख) 'क़ैसर' था, एक ख़त मिला। उसमें लिखा था कि, "हमें मालूम हुआ है कि आपके अमीर (हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु) ने आपके साथ अच्छा सुलूक नहीं किया और आप पर ज़ुल्म कर रहे हैं। अगर आप चाहें, तो हम अपनी फ़ौज आपकी मदद के लिए भेज देंगे।" अगर हम आपकी जगह होते, तो विरोधी (मुख़ालिफ़) को अपमानित व ज़लील करने और उसे शिकस्त देने के लिए फ़ौज मंगवा लेते। मगर होश के कानों से सुनने के क़ाबिल है वह जवाब, जो हज़रत अमीर मुआविया (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने क़ैसर-ए-रोम को दिया: "ऐ नसरानी (ईसाई) कुत्ते! तू हमारे मतभेद से फ़ायदा उठाना चाहता है?! याद रख, अगर तूने हज़रत अली (रज़ियल्लाहु अन्हु) की तरफ़ तिरछी निगाह से भी देखा, तो सबसे पहले हज़रत अली (रज़ियल्लाहु अन्हु) के लश्कर (फ़ौज) का सिपाही बनकर तेरी आँख फोड़ने वाला मैं हूँगा।" ऐसे सैकड़ों वाक़ियात (घटनाएँ) हैं, यहाँ मिसाल के तौर पर एक नक़्ल किया गया है। मक़सद यह है कि उम्मत के इत्तिहाद (एका) के लिए लाज़िम (ज़रूरी) है कि वे एक-दूसरे का सम्मान और आदर (एहतराम-ओ-इकराम) करें, और अपने मतभेदों को हदों से आगे न बढ़ने दें और आपस में हुस्न-ए-सुलूक (अच्छा बर्ताव) का मामला करें। (वाक़ियात पढ़िये और इब्रत लीजिये)

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