❶ एक ज़ाहिद (वैरागी) का क़िस्सा मंकूल (वर्णित) है कि वह रोटी के बिना सिर्फ़ सब्ज़ी और नमक वगैरह खा लेते थे। किसी ने कहा, "बस आप इसी पर गुज़ारा करते हैं?" उन्होंने फ़रमाया, "मैं अपनी दुनिया जन्नत (स्वर्ग) के लिए बना रहा हूँ और तू इसे बैतुल ख़ला (शौचालय) के लिए बनाता है। यानी, तू पसंदीदा खाने खाकर उन्हें शौचालय तक पहुँचाता है और मैं जो कुछ भी खाता हूँ, वह इसलिए ताकि इबादत और फ़रमांबरदारी के लिए ताक़त मिले और आख़िरकार जन्नत तक पहुँच सकूँ।" ❷ कहते हैं कि जब इब्राहीम बिन अदहम (रहमतुल्लाह अलैह) हम्माम (सार्वजनिक स्नानघर) में जाने लगे, तो हम्माम वाले ने उन्हें रोक दिया और कहा कि बिना उजरत (फ़ीस) के अंदर नहीं जा सकते। आप रो पड़े और अर्ज़ करने लगे, "ऐ अल्लाह! यह शैतानों और गुनहगारों के आने की जगह है और मुझे यहाँ मुफ़्त में दाख़िल होने की इजाज़त नहीं मिलती, तो मैं अम्बिया (नबियों) और सिद्दीक़ीन (सच्चे लोगों) के मुक़ाम यानी जन्नत में कैसे दाख़िल हो सकूँगा?" ❸ मंकूल है कि कुछ अम्बिया अलैहिमुस्सलाम की आसमानी तअलीमात और वह्य (प्रकाशना) में यह बात मिलती है कि: "ऐ इब्ने आदम (आदम के बेटे)! तू दोज़ख़ (नरक) को भारी क़ीमत देकर ख़रीदता है, मगर जन्नत को सस्ते दामों नहीं लेता।" इसकी वज़ाहत (व्याख्या) यह है कि एक गुनहगार आदमी अपने जैसे गुनहगारों की दावत करता है और उस पर सैकड़ों रुपये का ख़र्च भी मामूली समझता है, तो यह उसका दोज़ख़ का सौदा है जो उसने भारी क़ीमत पर हासिल किया। अगर वह अल्लाह की रज़ा (प्रसन्नता) के लिए एक दिरहम ख़र्च करके कुछ ज़रूरतमंदों की दावत करना चाहे, तो उसे भारी महसूस होता है, जबकि यही उसके लिए जन्नत की क़ीमत थी। ــــــــــــــــــــــــــــــــــــــــــــــــــــــــــــــــ पुस्तक: तन्बीहुल ग़ाफ़िलीन (पृष्ठ संख्या: ८८-८९) लेखक: नस्र बिन मोहम्मद इब्राहीम अबुल लैथ अस्मर्क़न्दी चयन: इस्लामिक ट्यूब प्रो ऐप
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admin | 30 October, 2026