मेरा दिल इन कंदीलों (लालटेनों) की पीली रोशनियों में डूबा हुआ...
Ummah Post
13 November, 2024

मेरा दिल इन कंदीलों (लालटेनों) की पीली रोशनियों में डूबा हुआ है, मक्का ने तो मुझे मेरी ज़ात (अस्तित्व) से चुरा लिया है।

मक्का! मैंने तेरी गलियों में अपना दिल खो दिया है, अब यह बाकी उम्र कैसे काटूँ कि तेरे शहर की हवाएँ मुझे ज़िंदा रखती हैं।

ऐ मक्का! रास्ते कहाँ बिकते हैं?

ताकि मैं तुम्हारी तरफ आने वाला सबसे छोटा रास्ता खरीद सकूँ।

"मक्का!! मैं तुम तक आने के लिए अब रब्ब-उल-आलमीन (सारे संसार के रब) का दरवाज़ा खटखटाऊँगा.... मुझे यक़ीन है वह खाली हाथ नहीं लौटाएगा, वही साधन (अस्बाब) पैदा करेगा, वही रास्ता बनाएगा।"

मैं जान नहीं पाता इस कैफ़ियत (अवस्था) को ऐ 'मख़्फ़ी',

कि मक्का मेरे दिल में है, या दिल मेरा मक्का में।

मेरा दिल करता है कि मैं मक्का की किसी घाटी को अपना मस्कन (आशियाना) बना लूँ, फिर मुझे जानने वाला कोई न हो।

बख़ुदा (ईश्वर की कसम)! अगर मैं इस शहर से निकलने का कोई रास्ता (सबील) पाता, तो (मक्का की तरफ) निकल जाता; न मैं लोगों को याद करता, न लोग मुझे याद करते।

— इमाम-उद-दुनिया, अहमद बिन हंबल (रहिमहुल्लाह) ☘️🌸

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