एक बार एक फ़कीर ने मुल्ला नसीरुद्दीन का घर देख लिया। अब वह रोज़ आता और खाने-पीने के सामान के साथ कुछ पैसे भी माँग कर ले जाता। मुल्ला नसीरुद्दीन उससे तंग आ चुके थे और उससे पीछा छुड़ाने की कोई तरकीब सोच रहे थे।
एक दिन मुल्ला नसीरुद्दीन खाना खाने बैठे ही थे कि वही फ़कीर आ धमका। मुल्ला नसीरुद्दीन ने झिड़क कर पूछा:
"आखिर तुम हो कौन? जो रोज़ आ धमकते हो?"
फ़कीर ने सादगी से जवाब दिया: "ख़ुदा का मेहमान!" मुल्ला नसीरुद्दीन तुरंत बाहर निकले, फ़कीर का हाथ पकड़ा और शहर की जामा मस्जिद ले गए। मस्जिद के अंदर पहुँचाकर कहा: "अब तक तो तुम सख़्त धोखे (गलतफ़हमी) में थे। वह घर जहाँ तुम हर रोज़ पहुँचते थे, मेरा घर है; लेकिन जब तुमने बताया कि तुम ख़ुदा के मेहमान हो, तो मैंने इसमें बेअदबी महसूस की कि ख़ुदा के मेहमान को ख़ुदा के घर से अनजान रखूँ।" इसके बाद वापस आते हुए कहा: "ख़बरदार! जो तुमने मेरे घर का रुख किया। ख़ुदा के मेहमान! ख़ुदा के घर को अच्छी तरह पहचान लो और इधर-उधर मत भटकते फिरो।"