उत्तर प्रदेश सरकार ने सरकारी नौकरियों में नियुक्ति से पहले उम्मीदवारों के चरित्र और पृष्ठभूमि की जांच के लिए नया आदेश जारी किया है। 28 अक्टूबर को प्रमुख सचिव एम. देवराज की ओर से जारी 21 पन्नों के इस आदेश के एक प्रावधान पर विपक्ष और छात्र संगठन सवाल उठा रहे हैं। सरकार ने 29 अक्टूबर को स्पष्टीकरण जारी कर इस आदेश की मीडिया व्याख्या को भ्रामक बताया है।
विवादित प्रावधान क्या है?
आदेश के पैरा 4 के मुताबिक, अगर कोई व्यक्ति ऐसे संगठन का सदस्य है जिसका घोषित उद्देश्य हिंसात्मक तरीकों से समाज की मौजूदा व्यवस्था को बदलना है, तो उसे सरकारी नौकरी के लिए अयोग्य माना जा सकता है।
उम्र 21 साल पूरी होनी चाहिए।
सत्यापन की तारीख से पिछले तीन सालों में ऐसी गतिविधि में भागीदारी होने पर ही नियम लागू होंगे।
व्यवहार में बदलाव के ठोस और सकारात्मक प्रमाण हों, तो इस धारणा को चुनौती दी जा सकती है।
सरकार की सफाई
राजनीतिक विचारधारा के आधार पर किसी को अयोग्य नहीं माना जाएगा।
सामान्य राजनीतिक विचार, सरकार की आलोचना और शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक गतिविधियां इसके दायरे में नहीं आतीं।
यह प्रावधान पहले के शासनादेशों में भी था, जिन्हें इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्देशों के पालन में एक जगह संकलित किया गया है। सरकार के अनुसार 1958 से 2021 के बीच के आदेशों को एक समेकित नीति में बदला गया है।
नियुक्ति अधिकारी अभ्यर्थी का विवरण DGP और गृह जनपद के जिलाधिकारी को भेजेगा। पिछले पांच साल में किसी दूसरे जिले में एक साल से ज्यादा रहने पर वहां के DM को भी भेजा जाएगा। पुलिस और स्थानीय अभिसूचना इकाई के रिकॉर्ड से रिपोर्ट बनेगी।
नियम जारी होने की तारीख से प्रभावी होंगे और लंबित सत्यापन भी इन्हीं के आधार पर निपटेंगे।
समर्थन में क्या कहा गया?
भाजपा के राज्यसभा सांसद राम प्रताप सिंह ने फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि सत्ता परिवर्तन चुनाव से होता है, गुंडई और अराजकता से नहीं।
विपक्ष और छात्र संगठनों का विरोध
अखिलेश यादव: तंज कसा कि "जो ऐसे कानून बना रहे हैं, वे खुद जल्द बेरोजगार होने वाले हैं।"
सपा प्रवक्ता उदयवीर: इसकी तुलना अंग्रेजी राज के नियमों से की। उनका सवाल था कि सत्ता बदलने की मांग और हिंसा से व्यवस्था बदलना एक कैसे हो सकता है?
कांग्रेस नेता आराधना मोना मिश्रा: इसे "असंवैधानिक" बताया और कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले छात्र इसके दायरे में नहीं आने चाहिए।
दिनकर कपूर (AIPF-रेडिकल): पूछा कि शांतिपूर्ण और हिंसक प्रदर्शन में फर्क कौन तय करेगा। उनका आरोप है कि आंदोलनकारियों पर गंभीर धाराओं में मुकदमे दर्ज कर उन्हें नौकरी से वंचित किया जा सकता है।
अंजलि (स्टूडेंट एक्टिविस्ट, 'दिशा'): उन्होंने नोएडा में मजदूरों के प्रदर्शन का उदाहरण देते हुए आशंका जताई कि शांतिपूर्ण आंदोलनों को भी हिंसक बताकर निशाना बनाया जा सकता है।
आलोचकों का तर्क है कि पिछले तीन महीनों में देश के कई हिस्सों में हुए बड़े प्रदर्शनों के बीच यह आदेश युवाओं में डर पैदा करने की कोशिश है।
ABVP का संतुलित रुख
ABVP की लखनऊ विश्वविद्यालय इकाई के पदाधिकारियों शक्ति सिंह और आशुतोष श्रीवास्तव ने कहा कि चरित्र सत्यापन जरूरी है, लेकिन प्रक्रिया निष्पक्ष और पारदर्शी हो। उन्होंने कहा कि विचारधारा, शांतिपूर्ण विरोध और हिंसक गतिविधि में स्पष्ट अंतर हो, प्रतिकूल रिपोर्ट पर अभ्यर्थी को पक्ष रखने का पूरा मौका मिले, और "अपराध और असहमति को एक ही तराजू में न तौला जाए।"