लीसेस्टर (ब्रिटेन) में उलेमा-ए-किराम (विद्वानों) की एक महफ़िल में एक बार हज़रत मौलाना शाह अबरारुल हक़ हरदोई साहब (रहमतुल्लाह अलैह) ने फ़रमाया: "मान लीजिए कि इंडिया के किसी गांव में किसी भारी शरीर वाले व्यक्ति का देहांत (انتقال) हो गया। जून-जुलाई की भीषण गर्मी हो, क़ब्रिस्तान कई किलोमीटर की दूरी पर हो और जनाज़ा उठाने वाले सिर्फ़ चार आदमी हों। रास्ते में उन्हें एक मुसाफ़िर (यात्री) मिला, उसने अपना सामान एक तरफ़ रखा और जनाज़े को कंधा देने वालों के साथ शामिल हो गया। हज़रत मौलाना शाह अबरारुल हक़ साहब (रह.) ने उलेमा से पूछा कि उन चार आदमियों को उस मुसाफ़िर के आने से ख़ुशी होगी या तकलीफ़?" सब उलेमा-ए-किराम ने कहा: "ख़ुशी होगी।" हज़रत मौलाना ने आगे फ़रमाया: "ये पांचों आदमी थोड़ा आगे बढ़े तो एक और मुसाफ़िर नज़र आया, उसने भी अपना सामान एक तरफ़ रखा और इन पांचों आदमियों के साथ जनाज़े को कंधा देने के लिए शामिल हो गया। हज़रत (रह.) ने फिर उलेमा-ए-किराम से पूछा कि बताओ, इस छठे आदमी के आने से पहले के पांच आदमी ख़ुशी महसूस करेंगे या तकलीफ़?" सबने कहा: "ख़ुशी।" तो फिर हज़रत (रह.) ने फ़रमाया: "इस समय हम सब भी दीन (धर्म) की ज़िम्मेदारी कंधों पर उठाकर चल रहे हैं और दीन की ख़िदमत (सेवा) कर रहे हैं। जब ऐसी बात है, तो हमें एक-दूसरे के काम को देखकर ख़ुश होना चाहिए, क्योंकि हम सबका मक़सद (उद्देश्य) एक ही है। तदरीस (शिक्षण), तस्नीफ़ (ग्रंथ रचना/लेखन), तब्लीग़ (धर्म प्रचार), जिहाद, सियासत (राजनीति), तसव्वुफ़ (आध्यात्मिकता), दर्स-ए-क़ुरआन और दर्स-ए-हदीस—ये सब दीन के ही अलग-अलग शोबे (क्षेत्र) हैं। अगर हम सब एक-दूसरे के रफ़ीक़ (साथी) होते, तो दुनिया का नक़्शा कुछ और ही होता; मगर शैतान हमें रफ़ीक़ बनने नहीं देता, वह हमेशा हमें एक-दूसरे से मुतनफ़्फ़िर (विमुख/दूर) करता रहता है। सीरत (पैगंबर मुहम्मद साहब के जीवन चरित्र) का एक अहम पहलू 'इत्तिफ़ाक़' (आपसी एकता और तालमेल) भी है, जिसे आज नज़रअंदाज़ किया जा रहा है।"
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admin | 1 November, 2026