فارسی کتابیں

رحیما شرح اردو کریما سعدی
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معین الفرائض
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تعلیل القران
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تعلیم النحو مع امثلہ قرانیہ و حدیثیہ
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درس علم الصیغہ مع خاصیات ابواب
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آسان اصول میراث
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امام ابو حنیفہؒ کے اصول حدیث
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سراج نبوی بشرح شمائل ترمذی
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परहेज़गार उस्ताद और समझदार शागिर्द

परहेज़गार उस्ताद और समझदार शागिर्द

हज़रत हकीमुल उम्मत थानवी और हज़रत शाह वसीउल्लाह इलाहाबादी (नूरुल्लाह मरक़दहुमा) दोनों ने यह वाक़िया नक़्ल किया कि एक परहेज़गार आलिम बच्चों को पढ़ाते थे। एक दिन उनके घर में फ़क्र व फ़ाक़ा (ग़रीबी और भुखमरी) था, भूख की शिद्दत (तीव्रता) से उनका चेहरा मुरझाया हुआ था। जो तलबा (छात्र) पढ़ने आते थे, उनमें से एक तालिब-ए-इल्म ने महसूस कर लिया कि हज़रत के यहाँ शायद फ़ाक़ा है। उसने कहा कि हज़रत अभी आता हूँ और चला गया। थोड़ी देर में अपने घर से खाना लेकर आया कि हज़रत यह खा लीजिए फिर पढ़ाइए। तो आलिम साहब ने कहा कि बेटा वाक़ई भूख का तक़ाज़ा तो है मगर अब मैं नहीं खा सकता क्योंकि मुझे 'इशराफ़-ए-नफ़्स' (नफ़्स की उम्मीद/अपेक्षा) हो गया। जब तुम जाने लगे तो मेरे दिल ने कहा कि शायद लड़के ने पहचान लिया है और अब यह खाना लेकर आएगा, और वैसे ही तुम लाए हो, तो बताओ यह इशराफ़ हुआ कि नहीं? और इसका खाना कैसे जाइज़ होगा? यह सुनना था कि तालिब-ए-इल्म खाना लेकर वापस हो गया कि ठीक है, आपको तो यह जाइज़ नहीं। अब उस्ताद ना-उम्मीद हो गए, मख़्लूक़ (सृष्टि) से तवज्जो हट गई और दिल अल्लाह की तरफ़ रुजू हो गया कि मौला अब तो आप ही खिलाने वाले हैं। थोड़ी ही देर गुज़री थी कि फिर वह तालिब-ए-इल्म खाना वापस लेकर आया और कहने लगा कि हज़रत अब तो इशराफ़ नहीं रहा, अल्लाह ही आपको खिला रहा है, खा लीजिए। उस्ताद बहुत ख़ुश हुए और कहा कि जज़ाकल्लाह, वाक़ई तेरी समझ क़ाबिल-ए-तहसीन (प्रशंसनीय) है और उसको क़बूल कर लिया। यह वाक़िया सुनाकर हज़रत वालिद माजिद (नूरुल्लाह मरक़दहू) फ़रमाते कि आज के तलबा न उस्ताद का हाल देखते हैं और न कुछ लाते हैं, हाँ अगर कोई लाता और इशराफ़ के तहत कोई उस्ताद वापस करता तो वह ख़ुश ही हो जाता कि चलो छुट्टी हो गई। वाक़ई दीन की समझ बहुत बड़ी चीज़ है। (माआरिफ़-ए-रहीमी: शैख़ुल हदीस हज़रत मौलाना शाह मोहम्मद ज़ाकिर रहीमी नूरुल्लाह मरक़दहू)

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