عربی ششم

تفسیرِ کمالین شرحِ اردو جلالین جلد 2
تفسیرِ کمالین شرحِ اردو جلالین جلد 2
تفسیرِ کمالین شرحِ اردو جلالین جلد 3
تفسیرِ کمالین شرحِ اردو جلالین جلد 3
تفسیرِ کمالین شرحِ اردو جلالین جلد 4
تفسیرِ کمالین شرحِ اردو جلالین جلد 4
تفسیرِ کمالین شرحِ اردو جلالین جلد 5
تفسیرِ کمالین شرحِ اردو جلالین جلد 5
تفسیرِ کمالین شرحِ اردو جلالین جلد 6۔7
تفسیرِ کمالین شرحِ اردو جلالین جلد 6۔7
قواعد تذکیر و تانیث
قواعد تذکیر و تانیث
افضل التطبیق علی مسائلِ القدوری
افضل التطبیق علی مسائلِ القدوری
نجوم الحواشی شرح اردو اصول الشاشی
نجوم الحواشی شرح اردو اصول الشاشی
القراءۃ الراشدۃ 3
القراءۃ الراشدۃ 3

मैं अपनी स्मृति में तुम्हारे बारे में सब कुछ भुला दूंगा।

मैं अपनी स्मृति में तुम्हारे बारे में सब कुछ भुला दूंगा।

हज़रत यह्या बिन मुआज़ रहमतुल्लाही अलैहि, जिनको हक़ायक़ व दक़ायक़ (आध्यात्मिक सच्चाइयों और बारीकियों) पर मुकम्मल दस्तरस (पूर्ण नियंत्रण) हासिल थी, और जिनके मुतअल्लिक़ (बारे में) कुछ बुज़ुर्गों का कहना है कि जिस तरह अम्बिया (पैगंबरों) में हज़रत यह्या बिन ज़करिया अलैहिमुस्सलाम का मक़ाम है, उसी तरह बुज़ुर्गान-ए-दीन (संतों) में हज़रत यह्या बिन मुआज़ रहमतुल्लाही अलैहि की हैसियत है। आपके असरदार मवाइज़ (उपदेशों) की वजह से आपको 'वाइज़' (उपदेशक) के नाम से पुकारा जाता था। आपका एक भाई ब-हैसियत मुजाविर (खादिम/सेवक) के मक्का मुअज़्ज़मा में मुक़ीम (रहते) था और उन्होंने वहाँ से ख़त लिखा कि मुझे तीन चीज़ों की बेहद तमन्ना (इच्छा) थी: अव्वल (पहली) यह कि किसी मुतबर्रक (पवित्र) मक़ाम पर सकूनत (रहने) का मौक़ा मिल जाए; दोम (दूसरी) यह कि मेरी ख़िदमत के लिए एक नेक ख़ादिम (सेवक) भी हो; लिहाज़ा ये दोनों ख़्वाहिशें पूरी हो गईं। अब तीसरी ख़्वाहिश यह है कि मरने से पहले एक मर्तबा आपसे मुलाक़ात हो जाए, यह मेरी दिली ख़्वाहिश है। ख़ुदा से दुआ कीजिए कि वह अपनी क़ुदरत से यह तमन्ना भी पूरी कर दे। आप रहमतुल्लाही अलैहि ने जवाब में यह तहरीर फ़रमाया (लिखा) कि, "इंसान को तो बज़ात-ए-ख़ुद (स्वयं) मुतबर्रक होना चाहिए ताकि उसकी बरकत से उसकी क़ियाम-गाह (रहने की जगह) भी मुतबर्रक हो जाए। दूसरी बात यह है कि आपको तो ख़ुद ख़ादिम बनना चाहिए था न कि मख़्दूम (जिसकी सेवा की जाए), इंसान की शान ही ग़ुलामी (ईश्वर की बंदगी और सेवा) में है। तीसरी बात यह है कि अगर आप ख़ुदा की याद से ग़ाफ़िल (बेख़बर) न होते, तो मैं आपको हरगिज़ याद न आता। लिहाज़ा याद-ए-इलाही में बहन, भाई, बीवी, बच्चे सब को फ़रामोश (भुला) कर देना चाहिए। अगर आप दुनिया में इबादत से ख़ुदा ही को राज़ी नहीं कर सकते, तो फिर मुझसे मुलाक़ात भी बे-सूद (व्यर्थ) है।" (तज़किरातुल औलिया: सफ़हा 173) ख़्वाजा मज्ज़ूब फ़रमाते हैं: याद में तेरी सब को भुला दूँ कोई न मुझ को याद रहे तुझ पर सब घर बार लुटा दूँ ख़ाना-ए-दिल आबाद रहे सब ख़ुशियों को आग लगा दूँ ग़म से तिरे दिल शाद रहे सब को नज़र से अपनी गिरा दूँ तुझ से फ़क़त फ़रियाद रहे अब तो रहे बस ता-दम-ए-आख़िर विर्द-ए-ज़बाँ ऐ मेरे इलाह ला इलाहा इल्लल्लाह, ला इलाहा इल्लल्लाह। ------------------------------------------------------- किताब: अस्लाफ़ की यादें (पृष्ठ: 227-228) लेखक: हज़रत मौलाना मुफ़्ती असदुल्लाह उमर नुमानी नक़ल कर्ता: इस्लामिक ट्यूब प्रो ऐप

सबसे हालिया

Naats