عربی دوم

قصص النبیین الجزء الثانی
قصص النبیین الجزء الثانی
قصص النبیین الجزء الثالث
قصص النبیین الجزء الثالث
قصص النبیین الجزء الرابع
قصص النبیین الجزء الرابع
قصص النبیین الجزء الخامس
قصص النبیین الجزء الخامس
تحفۃ الادب شرح اردو نفحۃ العرب
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اشرف الادب شرح اردو نفحۃ العرب
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تحفۃ الطلباء اردو شرح سفینۃ البلغاء
تحفۃ الطلباء اردو شرح سفینۃ البلغاء
اشرف الھدایہ جلد 16
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اشرف الھدایہ جلد 15
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एक विद्वान की हृदयविदारक कहानी

एक विद्वान की हृदयविदारक कहानी

चुनांचे मैं आपको एक अजीब और इब्रतनाक (सबक आमोज़) हिकायत (क़िस्सा) सुनाता हूँ जो मैंने मौलाना फ़तह मोहम्मद साहब रहमतुल्लाह अलैह से सुनी थी। मौलाना फ़रमाते हैं कि शेख़ दहान (तेल के व्यापारी) जो मक्का मुकर्रमा के एक बड़े आलिम थे, उन्होंने फ़रमाया कि मक्का मुकर्रमा में एक आलिम का इंतक़ाल हुआ और उनको दफ़्न कर दिया गया। कुछ समय के बाद किसी दूसरे शख्श का इंतक़ाल हुआ तो उसके वारिसों ने उन आलिम साहब की क़ब्र में उनको दफ़्न करना चाहा। मक्का मुकर्रमा में यही दस्तूर (प्रथा) है कि एक ही क़ब्र में वक़्त के साथ कई-कई मुर्दों को दफ़्न कर देते हैं। चुनांचे जब उन आलिम साहब की क़ब्र खोदी गई तो देखा कि उनकी लाश के बजाय एक निहायत हसीन (खूबसूरत) लड़की की लाश रखी हुई है और सूरत देखने से वह लड़की यूरोपियन मालूम होती थी। सबको हैरत हुई कि यह क्या मामला है। इत्तिफ़ाक़ से उस मजमे (भीड़) में यूरोप से आने वाला एक शख्श भी मौजूद था, उसने जो लड़की की सूरत देखी तो कहा, "मैं इसको पहचानता हूँ। यह लड़की फ्रांस की रहने वाली और एक ईसाई की बेटी है। यह मुझसे उर्दू पढ़ती थी और छुपे तौर पर (दर-पर्दा) मुसलमान हो गई थी। मैंने इसको दीनियात के चंद रिसाले (पुस्तिकाएं) भी पढ़ाए थे। इत्तिफ़ाक़ से बीमार होकर इंतक़ाल कर गई और मैं दिल-बर्दाश्ता (दुखी) होकर नौकरी छोड़कर यहाँ चला आया।" लोगों ने कहा कि उसके यहाँ मुंतक़िल (स्थानांतरित) होने की वजह तो मालूम हो गई कि वह मुसलमान और नेक थी, लेकिन अब यह बात दरयाफ़्त (पता) करने की है कि उन आलिम साहब की लाश कहाँ गई? कुछ लोगों ने कहा कि शायद आलिम की लाश उस लड़की की क़ब्र में मुंतक़िल कर दी गई हो। इस पर लोगों ने उस सियाह (यात्री) से कहा कि तुम हज से वापस होकर यूरोप जाओ तो उस लड़की की क़ब्र खोदकर ज़रा देखना कि उसमें मुसलमान आलिम की लाश है या नहीं, और एक सूरत-शनास (चेहरा पहचानने वाले) को भी साथ कर दिया। चुनांचे वह शख्श यूरोप वापस गया और लड़की के वालिदैन (माता-पिता) से उसका यह हाल बयान किया। इस पर उनको बड़ी हैरत हुई कि भला यह कैसे मुमकिन है कि लड़की को दफ़्न तो किया जाए फ्रांस में और तुम उसकी लाश मक्का मुकर्रमा में देख लो। आख़िर राय यह तय पाई कि इस लड़की की क़ब्र को खोदा जाए। चुनांचे उसके वालिदैन और चंद लोग इस हैरतअंगेज़ मामले की तफ़्तीश (जांच) के लिए क़ब्रिस्तान चले और लड़की की क़ब्र खोदी गई, तो वाक़ई उसके ताबूत में उसकी लाश न थी, बल्कि उसके बजाय वह मुसलमान आलिम हू-ब-हू वहाँ लेटे हुए थे जिनको मक्का मुकर्रमा में दफ़्न किया गया था। शेख़ दहान ने फ़रमाया कि उस सियाह ने किसी ज़रिए से हमको इत्तिला दी कि उनकी लाश यहाँ फ्रांस में मौजूद है। अब मक्का मुकर्रमा वालों को फ़िक्र हुई कि लड़की का मक्का पहुँच जाना तो उसके मक़बूल (अल्लाह के यहाँ स्वीकार) होने की अलामत (निशानी) है और उसके मक़बूल होने की वजह मालूम हो गई, मगर इस आलिम का मक्का मुकर्रमा से कुफ़्रिस्तान (ग़ैर-मुस्लिम देश) में पहुँच जाना किस बिना पर हुआ? उसके मरदूद (दुत्कारे जाने) होने की क्या वजह है? सबने कहा कि इंसान की असली हालत घर वालों को मालूम हुआ करती है, उसकी बीवी से पूछना चाहिए। चुनांचे लोग उसके घर गए और दरयाफ़्त किया कि तेरे शौहर में इस्लाम के ख़िलाफ़ कोई बात थी? उसने कहा, "कुछ भी नहीं, वह तो बड़ा नमाज़ी और क़ुरआन का पढ़ने वाला, तहज्जुद गुज़ार था।" लोगों ने कहा, "सोच कर बतलाओ, क्योंकि उसकी लाश दफ़्न के बाद मक्का मुकर्रमा से कुफ़्रिस्तान में पहुँच गई है, कोई बात इस्लाम के ख़िलाफ़ उसमें ज़रूर थी।" इस पर बीवी ने कहा, "हाँ, मैं उसकी एक बात पर हमेशा खटकती थी, वह यह कि जब वह मुझसे मसरूफ़ (शारीरिक संबंध में) होता और फ़राग़त (निपटने) के बाद ग़ुस्ल का इरादा करता तो यूँ कहा करता था कि: 'नसारा (ईसाइयों) के मज़हब में यह बात बड़ी अच्छी है कि उनके यहाँ ग़ुस्ल-ए-जनाबत (अपवित्रता के बाद का स्नान) फ़र्ज़ नहीं है।'" लोगों ने कहा, "बस यही बात है जिसकी वजह से ख़ुदा तआला ने उसकी लाश को मक्का मुकर्रमा से उसी क़ौम की जगह फेंक दिया जिसके तरीक़े को वह पसंद करता था।" हज़रात, आपने देखा कि यह शख्श ज़ाहिर में आलिम, तक़ी (परहेज़गार) और पूरा मुसलमान था, मगर तफ़्तीश के बाद मालूम हुआ कि उसमें एक बात कुफ़्र की मौजूद थी कि वह कुफ़्फ़ार के एक तरीक़े को इस्लामी हुक्म पर तरजीह (प्राथमिकता) देता था, और कुफ़्र को पसंद करना या उसे बेहतर समझना भी कुफ़्र है (इस्तेहसान-ए-कुफ़्र कुफ़्र है)। इसलिए वह तो पहले ही से मुसलमान न था। यह ज़रूरी नहीं कि हर जगह लाश मुंतक़िल हो जाया करे, मगर ख़ुदा तआला कहीं ऐसा भी करके दिखा देते हैं ताकि लोगों को इब्रत हो कि बद-हाली (बुरे आंतरिक स्वभाव) का नतीजा यह है। इसलिए मैं कहता हूँ कि जो काफ़िर होता है, उसमें अव्वल (शुरुआत) ही से कोई बात कुफ़्र की होती है जो तफ़्तीश और ग़ौर के बाद हमको भी मालूम हो सकती है, मगर हम ग़ौर नहीं करते। इसलिए कह देते हैं कि मुसलमान आर्य हो गया, हालांकि वह पहले ही से आर्य था, उसमें इस्लाम था ही नहीं, मगर हमको उसकी बद-हाली का इल्म न था; वरना जो मुसलमान होगा वह कभी काफ़िर नहीं हो सकता। इसी लिए शैतान के बारे में हक़ तआला का इर्शाद है: "व काना मिनल काफ़िरीन" कि वह पहले ही काफ़िरों में से था। सज्दा-ए-आदम अलैहिस्सलाम से इंकार करने के वक़्त ही काफ़िर नहीं हुआ, जिसका राज़ अह्ले-तहक़ीक़ (शोधकर्ताओं) ने इस तरह शेरो-शायरी में फ़रमाया है: "दर लौह बद नोविशता कि मलऊन शवद यके, बुर्दम गुमां ब-हर कस व बर ख़ुद गुमां न-बुर्द। आदम ज़े ख़ाक बूद व मन अज़ नूरे पाक ओ, गुफ़्तम मनम यग़ाना व ओ ख़ुद यग़ाना बूद।" यानी लौहे महफ़ूज़ में पहले ही से लिखा हुआ था कि आदम अलैहिस्सलाम की पैदाइश के वक़्त एक शख्श काफ़िर होगा (यानी उस वक़्त उसका कुफ़्र ज़ाहिर होगा) और शैतान लौहे महफ़ूज़ को पढ़कर इस वाक़िए से बाख़बर था कि एक शख्श काफ़िर होने वाला है। मगर उसको कभी अपने मुतअल्लिक़ यह एहतेमाल (आशंका) न हुआ कि शायद वह मैं ही हूँ। वह अपनी ताअत व इबादत की वजह से बेफ़िक्र था कि भला इतना बड़ा आबिद (इबादत गुज़ार) कभी काफ़िर हो सकता है? हरगिज़ नहीं, यह कोई और शख्श होगा। (ख़ुत्बाते हकीमुल उम्मत जिल्द 22, सफ़्हा: 368, 369) ____________📝📝____________ किताब: जवाहर ख़ुत्बात। सफ़्हा नंबर: 291-292-293 । तालीफ: उस्ताजुल कुर्रा क़ारी ज़ियाउर्रहमान साहब। चयन: इस्लामिक ट्यूब प्रो ऐप। ____________📝📝____________

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