عربی چھارم

توضیح البلاغہ شرح اردو دروس البلاغہ
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تحفۃ البلاغہ شرح اردو دروس البلاغہ
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تفہیم البلاغہ شرح اردو دروس البلاغہ
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دروس البلاغہ عربی
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دروس البلاغہ اردو
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نحو میر اردو
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درسِ حسامی شرح اردو حسامی
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جامع ترمذی مترجم
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توضیحات اردو شرح مشکوۃ المصابیح جلد  1
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नबी करीम ﷺ की तर्बियत का हिकमत भरा तरीक़ा

नबी करीम ﷺ की तर्बियत का हिकमत भरा तरीक़ा

नबी करीम ﷺ की तर्बियत का एक तरीक़ा यह था कि पहले ग़लती का एहसास दिलाते थे, फिर नसीहत फ़रमाते थे। एक मर्तबा आप सहाबा इकराम की मजलिस में तशरीफ़ फ़रमा थे, एक नौजवान मस्जिद में दाख़िल हुआ और इधर-उधर देखने लगा, गोया किसी की तलाश में है। उसे रसूलुल्लाह ﷺ दिखाई दिए, वह आपकी तरफ़ आया और कहने लगा, "या रसूलुल्लाह ﷺ! मुझे ज़िना (व्यभिचार) की इजाज़त दीजिए।" ग़ौर फ़रमाइए कि उसने कितनी बड़ी जुर्रत की, लेकिन क़ुरबान जाइए मुअल्लिम-ए-इंसानियत ﷺ पर कि आप पर ज़र्रा बराबर भी ख़फ़गी (नाराज़गी) के आसार दिखाई नहीं दिए। अगर आपकी जगह आज के दौर का कोई मुरब्बी (गुरु/मार्गदर्शक) होता तो पता नहीं क्या कर गुज़रता। इस नौजवान के इस क़िस्म के सवाल पर आपने उसकी दीनी हालत को भांप लिया कि यह दीनी एतबार से कमज़ोर नौजवान है, लेकिन उसके अंदर पाए जाने वाले ईमान ने उसे इजाज़त लेने पर आमादा (प्रेरित) किया। आपने उस नौजवान को फ़ौरन नसीहत नहीं फ़रमाई, बल्कि पहले उसे ग़लती का एहसास दिलाया। चुनांचे आपने उस नौजवान से पूछा, "क्या तुम्हें अपनी वालिदा (माँ) के साथ ज़िना किया जाना पसंद है?" उसने कहा, "नहीं।" तो आपने फ़रमाया, "इसी तरह दूसरे लोग भी अपनी माताओं के लिए इसे पसंद नहीं करते।" फिर दरयाफ़्त (पूछा) किया, "क्या तुम अपनी बेटी के लिए ज़िना को पसंद करते हो?" जवान ने कहा, "नहीं।" तो आपने फ़रमाया कि "दूसरे लोग भी अपनी बेटियों के लिए ज़िना को पसंद नहीं करते।" आपने फिर पूछा, "क्या तुम अपनी बीवी या ख़ाला के लिए ज़िना को पसंद करते हो?" उसने कहा, "नहीं।" बिलआख़िर आपने फ़रमाया कि "लोगों के लिए भी वही पसंद करो, जो तुम अपने लिए पसंद करते हो।" इस तरह के सवालात का मक़सद उसको ग़लती का एहसास दिलाना था। जब उस नौजवान को अपनी ग़लती का इदराक (अहसास) हो गया तो आपने उसके सीने पर हाथ रखा और दुआ की, "ऐ अल्लाह! इसके दिल को हिदायत दे, इसका गुनाह माफ़ कर और इसकी शर्मगाह की हिफ़ाज़त कर।" वह नौजवान यह कहता हुआ मस्जिद से बाहर आया, "ब-ख़ुदा (अल्लाह की क़सम) मैं रसूलुल्लाह ﷺ के पास आया तो कोई काम मुझे ज़िना से ज़्यादा पसंदीदा नहीं था और अब हालत यह है कि कोई काम मुझे ज़िना से बढ़कर नापसंद नहीं।" (मुस्नद अहमद, हदीस नंबर: 21708) ___________📝📝___________ किताब: मौजूदा हालात में सीरत-ए-रसूल ﷺ का पैग़ाम सफ़ा नंबर: 258 - 258 पसंद फ़रमूर्दा: हज़रत मौलाना पीर ज़ुल्फ़िकार अहमद नक़्शबंदी चयन: इस्लामिक ट्यूब प्रो ऐप

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