عربی اول

کتاب النحو جلد ۱
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کتاب النحو جلد ۲
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کتاب النحو جلد ۳
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میزان العلوم شرح سلم العلوم
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تفہیم المسالک شرح مؤطا امام مالک
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اوضح التسہیل لشرح ابن عقیل جلد ۱
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اوضح التسہیل لشرح ابن عقیل جلد ۲
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ضوء المصباح شرح تلخیص المفتاح
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آسان ترجمہ صحیح بخاری
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पांच व्यापक तफ़सीरें (पांच जामे तफ़ासिर)

पांच व्यापक तफ़सीरें (पांच जामे तफ़ासिर)

शेख़-उल-हदीस हज़रत मौलाना मोहम्मद तक़ी उस्मानी साहब (दामत बरकातुहुम) अपनी मशहूर तस्नीफ़ "उलूम-उल-क़ुरआन" में लिखते हैं: "यह पांच तफ़सीरें (यानी तफ़सीर-ए-कबीर, तफ़सीर इब्न कसीर, तफ़सीर-ए-क़ुर्तुबी, तफ़सीर रूह-उल-मआनी और तफ़सीर-ए-कश्शाफ़) अहक़र (इस नाचीज़) के मामूली ज़ौक़ के मुताबिक ऐसी हैं कि अगर कोई शख़्स सिर्फ़ इन्हीं पर इक्तिफ़ा (संतोष) कर ले, तो इंशाअल्लाह तआला मजमूई (सामूहिक) हैसियत से ये उसे दूसरी तफ़सीरों से बेनियाज़ (मुक्त) कर देंगी। यह अहक़र की ज़ाती राय थी, बाद में अपने मख़दूम बुज़ुर्ग हज़रत मौलाना सैयद मोहम्मद यूसुफ़ बनूरी साहब मद्द ज़िल्लुहुमुल आली के एक मक़ाले (लेख) से इसकी तक़रीबन हरफ़-ब-हरफ़ ताईद (पुष्टि) हो गई, फ़लिल्लाहिल हम्द। मौसूफ़ अपने गिरां-क़द्र (बहुमूल्य) मक़ाले "यतीमतुल बयान" में तहरीर फ़रमाते हैं: 'चूंकि उम्र-ए-अज़ीज़ कम है, आफ़ात-ए-ज़माना ज़्यादा और हमारे दौर में हिम्मतें पस्त और अज़ाइम (इरादे) कमज़ोर हो गए हैं... इसलिए मैं अपने तालिबे-इल्म (विद्यार्थी) भाइयों को चार ऐसी तफ़सीरों की निशानदेही करना चाहता हूँ कि अगर कोई शख़्स उन पर क़नाअत (संतोष) करना चाहे तो वो इंशाअल्लाह तआला काफ़ी होंगी। ❶. एक तफ़सीर इब्न कसीर... जिसके बारे में हमारे उस्ताद (हज़रत अल्लामा अनवर शाह साहब कश्मीरी रहमतुल्लाह अलैह) फ़रमाते थे: "अगर कोई किताब किसी दूसरी किताब से बेनियाज़ कर सकती है तो वो तफ़सीर इब्न कसीर है, जो तफ़सीर इब्न जरीर से बेनियाज़ कर देती है।" ❷. दूसरी तफ़सीर-ए-कबीर इमाम राज़ी, जिसके बारे में हमारे उस्ताद फ़रमाते थे: "क़ुरआन करीम की मुश्किलात में मुझे कोई मुश्किल ऐसी नहीं मिली जिससे इमाम राज़ी रहमतुल्लाह अलैह ने तअर्रुज़ (चर्चा) न किया हो, यह और बात है कि बाज़ औक़ात मुश्किलात का हल ऐसा पेश नहीं कर सके जिस पर दिल मुतमइन (संतुष्ट) हो जाए और इसके बारे में जो कहा गया है 'फ़ीहि कुल्लु शैइन इल्लत-तफ़सीर' (इसमें तफ़सीर के अलावा सब कुछ है), यह तो ख़्वाह-मख़्वाह उनकी जलालत-ए-क़द्र (महानता) को कम करके दिखाना है और शायद यह किसी ऐसे शख़्स का क़ौल है जिस पर रिवायतों का ग़लबा था और क़ुरआन करीम के लताइफ़ व उलूम की तरफ़ तवज्जोह न थी।" ❸. तीसरी तफ़सीर रूह-उल-मआनी जो मेरे नज़दीक क़ुरआन करीम की ऐसी तफ़सीर है जैसे सहीह बुख़ारी रहमतुल्लाह अलैह की शरह (व्याख्या) फ़त्हुल बारी, इल्ला यह कि फ़त्हुल बारी एक कलाम-ए-मख़्लूक़ की शरह है, इसलिए उसने शरह बुख़ारी का जो क़र्ज़ उम्मत पर था उसे चुका दिया है और अल्लाह तआला का कलाम इससे बुलंद व बरतर है कि कोई बशर (इंसान) उसका हक़ अदा कर सके। ❹. चौथी तफ़सीर अबी अस्सऊद है, जिसमें नज़्म-ए-क़ुरआनी को बेहतरीन इबारत में बयान करने पर ख़ास तवज्जोह दी गई है और वो बसा औक़ात ज़मख़्शरी की कश्शाफ़ से बेनियाज़ कर देती है।' इस इबारत में तफ़सीर-ए-क़ुर्तुबी रहमतुल्लाह अलैह को छोड़कर उन्हीं चार किताबों का तज़किरा उन्हीं ख़ूसूसियात के साथ किया गया है जो नाचीज़ की समझ में आई थीं। हज़रत शाह साहब रहमतुल्लाह अलैह और उनके तल्मीज़-ए-रशीद (होनहार शागिर्द) हज़रत बनूरी मद्दज़िल्लुहुम के साथ इस तवाफ़ुक़ (सहमती) पर मैं अल्लाह तआला का शुक्रगुज़ार हूँ। __________📝📝__________ (किताब : तहरीर कैसे सीखें? सफ़ा नंबर : 270 मुसन्निफ़ : मुफ़्ती अबू लुबाबा शाह मन्सूर इंतिख़ाब : इस्लामिक ट्यूब प्रो ऐप)

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