عربی ششم

تسہیل شرح نخبۃ الفکر
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تحفہ نصیر شرح نحو میر
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طریق الوصول الی علوم البلاغۃ شرح میزان البلاغۃ
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شرح موجز البلاغۃ
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الکاملة لحل اسئلة الکتب الخمسہ
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درس بخاری
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فلاح و بہبود شرح اردو ابو داود جلد ١
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فلاح و بہبود شرح اردو ابو داود جلد ٢
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تنقیش النحو
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घी चोर नौकर

घी चोर नौकर

एक व्यक्ति एक किराने की दुकान पर नौकरी करता था। वह किसी न किसी बहाने दुकान से कुछ न कुछ चोरी करता रहता था। दुकान का मालिक बहुत ही खुशमिज़ाज (अच्छे अख़्लाक़ वाला) और ईमानदार इंसान था। वक़्त गुज़रता गया और दस-बारह साल बीत गए। अल्लाह ने मालिक को खूब बरकत दी और उसकी दुकान शहर की सबसे बड़ी दुकान बन गई। रोज़ाना लाखों की आमदनी होने लगी। एक दिन उस नौकर के घर से टिफिन में खाना आया हुआ था। नौकर ने चोरी-छिपे टिफिन में देसी घी डाल दिया। अल्लाह की शान देखिए कि वापस ले जाते समय उसके बच्चे से टिफिन नीचे गिरकर खुल गया और उसकी चोरी पकड़ी गई। मालिक का बेटा ग़ुस्से में आ गया और नौकर को बुरा-भला कहने लगा, मगर मालिक ने अपने बेटे को सख़्ती से रोक दिया और कहा: "बेटा! इसे छोड़ दो। तुम्हें आज पता चला है कि यह चोरी करता है, मगर मुझे पिछले बारह साल से मालूम है। इसके बावजूद मैंने उसे कभी समझाने के अलावा कुछ नहीं कहा। बस इतना सोचो कि हमारे लिए इतना ही काफ़ी है कि उसकी रोज़ाना की चोरी के बावजूद भी हम कहाँ से कहाँ पहुँच चुके हैं और यह बारह साल चोरी करके भी आज तक नौकर का नौकर ही है।" इसी तरह ईमानदार इंसान अपनी ईमानदारी और मेहनत के ज़रिए कहाँ से कहाँ जा पहुँचता है, मगर धोखेबाज़ और चोर गंदगी में ही पड़ा रह जाता है। (मनक़ूल / साभार)

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