عربی ہفتم دورہ حدیث شریف

نصر الباری شرح اردو صحیح البخاری جلد ١١
نصر الباری شرح اردو صحیح البخاری جلد ١١
نصر الباری شرح اردو صحیح البخاری جلد ١٢
نصر الباری شرح اردو صحیح البخاری جلد ١٢
نصر الباری شرح اردو صحیح البخاری جلد ١٣
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فتح اللہ الاحد بتوضيح الادب المفرد جلد ١
فتح اللہ الاحد بتوضيح الادب المفرد جلد ١
فتح اللہ الاحد بتوضيح الادب المفرد جلد ٢
فتح اللہ الاحد بتوضيح الادب المفرد جلد ٢
فتح اللہ الاحد بتوضيح الادب المفرد جلد ٣
فتح اللہ الاحد بتوضيح الادب المفرد جلد ٣
درسی سوال و جواب
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فیض المنعم شرح اردو مقدّمہ مسلم
فیض المنعم شرح اردو مقدّمہ مسلم
دروس اللغة العربية لغير الناطقين بها الجزء الأول
دروس اللغة العربية لغير الناطقين بها الجزء الأول

दुनिया की हक़ीक़त और आख़िरी सफ़र की तैयारी

दुनिया की हक़ीक़त और आख़िरी सफ़र की तैयारी

रसूलुल्लाह ﷺ फ़रमाया करते थे: "मेरा दुनिया से क्या तअल्लुक़ (संबंध)? मेरी दुनिया की मिसाल तो ऐसी ही है कि जैसे कोई सवार किसी दरख़्त (पेड़) के साए में (दम लेने के लिए) ठहर जाए, फिर उसे छोड़ कर चला जाए।" हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम ने अपने साथियों को वसीयत फ़रमाई: "(दुनिया से) गुज़र जाओ, इसे आबाद करने में न लगो।" एक आदमी हज़रत अबू ज़र रज़ियल्लाहु अन्हु के पास गया। उनके घर में इधर-उधर नज़र दौड़ाने लगा (सामान नाम की कोई चीज़ नज़र न आई) तो पूछा, "आपका सामान कहाँ है?" आपने फ़रमाया: "हमारा एक दूसरा घर (जन्नत) है, हमारी तवज्जो (ध्यान) उसी तरफ़ है।" उसने कहा, "जब तक आप यहाँ हैं (कुछ न कुछ) सामान ज़रूरी है।" आपने फ़रमाया: "घर का मालिक हमें रहने ही नहीं देगा।" हज़रत उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ (रहमतुल्लाह अलैह) ने अपने ख़ुत्बे (भाषण) में फ़रमाया: "दुनिया तुम्हारा स्थायी ठिकाना नहीं है। अल्लाह तआला ने इसके लिए फ़ना (नाश) लिख दी है और दुनिया के लोगों के लिए सफ़र लिख दिया है। कितने ही आबाद घर जल्द ही वीरान हो जाएंगे और कितने ही मकानों में रहने वाले जिन पर रश्क (ईर्ष्या) किया जाता है, बहुत जल्द कूच कर जाने वाले हैं। इसलिए अच्छी तरह कूच की तैयारी करो और बेहतरीन तोशा-ए-सफ़र (सफ़र का सामान) तक़्वा (परहेज़गारी) है, इसी को साथ लो।" हज़रत अता सुल्मी (रह.) दुआ फ़रमाया करते थे: "ए मेरे परवरदिगार! दुनिया में मेरी अजनबीयत पर रहम फ़र्मा, क़ब्र में मेरी वहशत (घबराहट) पर रहम फ़र्माना और कल जब तेरे सामने पेशी होगी, उस मौक़े पर रहम फ़र्माना।" हज़रत दाऊद ताई (रह.) कहते हैं कि मैंने हज़रत अतवान बिन अम्र तैमी (रह.) से पूछा: "(ज़िंदगी के तअल्लुक़ से) कम से कम उम्मीद क्या है?" आपने फ़रमाया: "बस जितनी देर एक सांस चलती है।" हज़रत फ़ुज़ैल बिन अयाज़ (रह.) से जब यह ज़िक्र किया गया तो वह रो पड़े और कहा कि हज़रत अतवान (रह.) मौत से बहुत चौकन्ना रहते थे, इसलिए फ़रमाया 'सांस चलने तक', यानी वह डरते थे कि वह सांस पूरी होने से पहले ही न मर जाएं। हज़रत हबीब अबू मुहम्मद (रह.) रोज़ाना वसीयत कर दिया करते थे (जैसे मौत के वक़्त की जाती है) कि कौन ग़ुस्ल (स्नान) देगा इत्यादि, और सुबह-शाम रोया करते थे। उनकी पत्नी से रोने का कारण पूछा गया तो उन्होंने कहा कि वह अल्लाह तआला से डरते हैं कि शाम हुई है शायद सुबह न हो, और सुबह हो गई है तो शायद शाम न हो। हज़रत हसन (बसरी - रह.) का क़ौल (कथन) है: "ऐ इब्ने आदम (मनुष्यों)! तुम्हें दो सवारियाँ सफ़र करा रही हैं; रात, दिन के हवाले करती है और दिन, रात के, यहाँ तक कि दोनों एक दिन तुम्हें आख़िरत (परलोक) के हवाले कर देंगी। तुमसे ज़्यादा ख़तरे में कौन है?" इमाम औज़ाई (रह.) ने अपने एक भाई को लिखा: "समझ लो कि तुम्हें हर तरफ़ से घेरा जा चुका है, और शब-ओ-रोज़ (रात-दिन) बराबर घसीट कर ले जाया जा रहा है; अल्लाह तआला और उसका सामना करने से डरो।" _____________________________________ किताब: वक़्त का बेहतरीन इस्तेमाल (सफ़्हा नंबर १६२-१६३) लेखक: मोहम्मद बशीर जुम्मा चयन: इस्लामिक ट्यूब प्रो ऐप

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