عربی دوم

درایة النحو شرح ہدایة النحو
درایة النحو شرح ہدایة النحو
تحفة المنعم اردو شرح  صحیح مسلم 1
تحفة المنعم اردو شرح صحیح مسلم 1
تحفة المنعم اردو شرح صحیح مسلم 2
تحفة المنعم اردو شرح صحیح مسلم 2
تحفة المنعم اردو شرح صحیح مسلم 3
تحفة المنعم اردو شرح صحیح مسلم 3
ریاض الصالحین
ریاض الصالحین
مظاہر حق جلد 5
مظاہر حق جلد 5
اشراق نوری ترجمہ اردو قدوری
اشراق نوری ترجمہ اردو قدوری
علم النحو مع ترکیب
علم النحو مع ترکیب
رہبر فارسی
رہبر فارسی

शम्अ-ए-फ़रोज़ां: दीने हक़ और इब्राहीमी फ़ित्ना

शम्अ-ए-फ़रोज़ां: दीने हक़ और इब्राहीमी फ़ित्ना

(मुलाख़्ख़स - इस्लामिक ट्यूब प्रो ऐप) अल्लाह तआला ने हर चीज़ के लिए एक मुक़र्रर रास्ता बनाया है। खाना मुँह से मेदे तक जाता है, जहाँ लुआब इसे हज़्म के क़ाबिल बनाता है। साँस नाक से फेफड़ों तक जाती है। अगर कोई इस कुदरती निज़ाम को बदलने की कोशिश करे, जैसे खाना नाक में डाले, तो ज़िंदगी ख़तरे में पड़ जाती है। बिल्कुल इसी तरह, अल्लाह ने इंसान की दुनियावी और उख़रवी कामयाबी के लिए एक रास्ता बनाया—इस्लाम। यह वह दीन है जो अल्लाह के रसूलों ने सिखाया, जिसमें अल्लाह की रज़ा के सामने सर तस्लीम ख़म करना है। इरशादे-रब्बानी है: इन्नद-दीन इन्दल्लाहिल इस्लाम (आले इमरान: 19)। इसके अलावा कोई रास्ता मक़बूल नहीं, जैसा कि फ़रमाया: वमंय यब्तग़ि ग़ैरल् इस्लामि दीनन फ़लंय युक़्बला मिन्हु (आले इमरान: 85)। इस्लाम की आफ़ाक़ी हक़ीक़त इस्लाम अव्वल दिन से मौजूद है। हज़रत आदम (अ.स.) से लेकर तमाम अंबिया ने इसी की दावत दी। हज़रत इब्राहीम (अ.स.) ने अपने बेटों को इसी की वसीयत की: फ़ला तमूतुन्ना इल्ला व-अन्तुम मुस्लिमून (अल-बक़रह: 132)। उनकी नस्ल से दो अज़ीम शाख़ें फैलीं—हज़रत इस्माईल (अ.स.) से नबी अकरम (सल्ल.) और हज़रत इस्हाक़ (अ.स.) से अंबिया बनी इस्राईल। मक्का में काबा और बैतुल मुक़द्दस की तामीर भी हज़रत इब्राहीम (अ.स.) के हाथों हुई। यहूदियत और ईसाइयत भी उन्हीं से मंसूब हैं, मगर तहरीफ़ ने उनकी असलियत म्सख़ कर दी। सिर्फ़ इस्लाम, जो क़ुरआन और नबी (सल्ल.) के ज़रिए मुकम्मल हुआ, दीने इब्राहीमी की सच्ची शक्ल है। इब्राहीमी फ़ित्ना: मग़रिब की साज़िश आज मग़रिब 'इब्राहीमिया' के नाम से एक नया फ़ित्ना फैला रहा है, जिसका मक़सद इस्लाम, यहूदियत और ईसाइयत को मिलाकर एक नया मख़लूत मज़हब बनाना है। इसकी इब्तिदा 1979 के कैंप डेविड मुआहदे से हुई, जब अमेरिकी सदर जिमी कार्टर ने 'इब्राहीम के बेटों' के लिए अमन की बात की। 1993 के ओस्लो और 1994 के उर्दुन-इस्राईल मुआहदों में भी यही इस्तलाह इस्तेमाल हुई। 2020 में 'इब्राहम एकॉर्ड' के तहत अरब इमारात और बहरीन ने इस्राईल से तअल्लुक़ात उस्तुवार किए, और अबू धाबी में 'इब्राहिमिया हाउस' बनाया गया, जहाँ मस्जिद, चर्च और यहूदी इबादतगाह एक ही अहाते में हैं। यह वहदते अदयान की आलमी कोशिश है, जो मुस्तक़बिल में हिंदू और बुद्ध मत को भी शामिल कर सकती है। इस्लाम का रद्देअमल इस्लाम में मख़लूत मज़हब का कोई तसव्वुर नहीं। अक़ीदा तौहीद, शरीयत और अख़लाक़ पर मबनी इस्लाम दीगर मज़ाहिब से अलग है। यहूदियत और ईसाइयत ने शरीयत को तर्क कर दिया, जबकि इस्लाम ने हलाल व हराम के अहकाम को निज़ाम की शक्ल दी। सूद और ज़िना की हुरमत पर क़ुरआन और तौरेत का इत्तेफ़ाक़ है, मगर मग़रिब इन्हें फ़रोग़ देता है। हज़रत इब्राहीम (अ.स.) ने शिर्क से बराअत का ऐलान किया: इन्नी बरीउम मिम्मा तुशरिकून (अल-अनआम: 78)। नबी (सल्ल.) ने भी मक्का वालों की मख़लूत मज़हब की पेशकश ठुकराई: ला अअबुदु मा ताबुदून (अल-काफ़िरून: 2)। मुसैलमा कज़्ज़ाब और अकबर के 'दीने इलाही' जैसी कोशिशें भी नाकाम हुईं। हल क्या है? मज़ाहिब के दरमियान रवादारी का रास्ता क़ुरआन ने बताया: लकुम दीनुकुम वलिय दीन (अल-काफ़िरून: 6)। हर मज़हब अपने अक़ीदे पर क़ायम रहे और दूसरों के हुक़ूक़ का एहतेराम करे। जान, माल, इज़्ज़त और मज़हबी जज़्बात की हिफ़ाज़त ज़रूरी है। मुसलमानों को इस फ़ित्ने से होशियार रहना चाहिए और दीने हक़ पर इस्तक़ामत दिखानी चाहिए। अल्लाह आलमे-इस्लाम को इस साज़िश से महफ़ूज़ रखे।

सबसे हालिया

Naats