عربی ششم

مظاہر حق جلد 2
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مظاہر حق جلد 3
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مظاہر حق جلد 4
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تقریر کافیہ شرح کافیہ ۱
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تقریر کافیہ شرح کافیہ ۲
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ہادیہ شرح کافیہ
ہادیہ شرح کافیہ
ہادیہ شرح کافیہ ۲
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مبادیٔ الفلسفہ
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معین الفلسفہ
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दिल और दिमाग का संतुलन

दिल और दिमाग का संतुलन

दुनिया दिल और दिमाग को एक ही खाने में रख देती है, दोनों का सिरा एक दूसरे से इस तरह मिला देती है जैसे उनमें कोई अंतर या विशेषता न हो, या फिर एक छोर यह है कि दोनों के बीच इस कदर दूरी पैदा कर देती है जैसे दोनों का अस्तित्व ही एक दूसरे से दूर और अलग रहना हो। सही बात यह है कि दोनों ही रास्ते अतिवाद (انتہا پسندی) के हैं। दिल और दिमाग दोनों ऐसे तार हैं कि जब तक वे एक दूसरे से न मिलें, कोई चीज़ वजूद (अस्तित्व) में नहीं आती। मेडिकल साइंस भी दोनों को एक दूसरे का साथी मानती है। यह बात अलग है कि दोनों की वैचारिक विशेषता है, लेकिन दोनों में दर्द और अपनेपन का रिश्ता है। एक से इंसान किसी चीज़ का एहसास (ادراک) करता है, तो दूसरे से उस एहसास की अच्छाई और बुराई (حسن و قبح) को जानता है। हमेशा दिल पर निर्भर रहना या फिर हमेशा दिमाग को ही अपना साथी मानना ठीक नहीं है। अक्सर इस रिश्ते को तोड़ दिया जाता है जो दोनों तत्वों के बीच है, यही वजह है कि कई बार अतिवाद, पक्षपात और कभी बुज़दिली, बेदिली और लापरवाही का सामना करना पड़ता है। जबकि दोनों एक हंसमुख और एक दूसरे के मददगार हैं, सहायक हैं। इसलिए जिस तरह दो विपरीत (متضاد) तारों को सही से न जोड़ा जाए तो ब्लास्ट हो जाता है, उसी तरह अगर दिल और दिमाग के दोनों तारों को भी बेहतर तरीके से न जोड़ा जाए तो तबाही का ही दरवाज़ा खुलता है। कहते हैं कि पश्चिमी देशों ने दिमाग का दरवाज़ा खोला तो तरक्की पाई और पूर्वी देशों ने दिल के दरवाज़े खोलकर तरक्की पाई; इसीलिए दोनों नदी के दो किनारों पर हैं, कोई मेल-मिलाप नहीं है। एक दिल की दुनिया आबाद करने को कहता है, तो दूसरा मशीनों को आबाद करना चाहता है; लेकिन चूंकि दोनों अलग-अलग हैं इसलिए दोनों में बिखराव, मतभेद और कभी-कभी अशांति भी पाई जाती है। इस दिल और दिमाग के रिश्ते को जनाब कलीम आजिज़ साहब मरहूम ने बहुत अच्छी तरह समझा है और समझाया है, जो पढ़ने के क़ाबिल है। आप लिखते हैं: "हाँ, एक बात अर्ज़ करूँगा—लोग दिल की बातों को बहुत ज़्यादा दिमागी बातों से सजाकर और परतदार (تہہ دار) बनाकर पेश करने के आदी होते हैं। मैं दिल और दिमाग को अलग-अलग काम करने वाला नहीं मानता। दोनों का काम समानांतर (متوازی) है, इसलिए इन्हें संतुलित ही रहना चाहिए। और यह संतुलन प्राकृतिक है। बिना दोनों के मिलकर काम किए कला (فن) पैदा ही नहीं हो सकती। मैं घुमा-फिराकर बात करने का बिल्कुल कायल नहीं हूँ। मैं दोनों में किसी को शासक या सेवक, हावी या दबा हुआ नहीं समझता। ये हंसमुख साथी हैं। एक दूसरे के आज्ञाकारी, एक दूसरे के दोस्त, एक दूसरे के हाल से वाक़िफ़, राज़ को जानने वाले और मददगार हैं। दोनों हाथों में हाथ डाले, कंधे से कंधा मिलाए, क़दम से क़दम मिलाकर चलते हैं। कोई एक दूसरे से आगे निकलने की कोशिश नहीं करता। मेरे यहाँ दोनों का तालमेल और एक जैसा मिज़ाज होना सबसे ज़रूरी है। मैंने चबा-चबा कर बात नहीं की है, दिल खोलकर रख दिया है और दिल वालों के सामने रखा है, दिमाग वालों के सामने रखा है, और यक़ीन के साथ रखा है, भरोसे के साथ रखा है। उसी भरोसे के साथ जिस भरोसे के साथ मीर साहब कहते हैं कि: बातें हमारी याद रहें फिर बातें न ऐसी सुनियेगा कहते किसी को सुनियेगा तो देर तक सर धुनियेगा (वो जो शायरी का सबब हुआ: 175)" ✍ मुहम्मद साबिर हुसैन नदवी

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