عربی دوم

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خاصیات ابواب
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تنقیش النحو
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المرقاة
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تحفة المنظور شرح اردو مرقات
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المرقات
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مفتاح السعادة شرح مفتاح العربیۃ جلد ٢
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تیسیر الاصول شرح اردو تسہیل الاصول
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आज ही तो ग़रीबी का असली मज़ा मिला है

आज ही तो ग़रीबी का असली मज़ा मिला है

एक गाँव में एक ग़रीब नाई रहा करता था जो एक पेड़ के नीचे कुर्सी लगाकर लोगों की हजामत (बाल-दाढ़ी) बनाया करता था। उसकी गुज़र-बसर बहुत मुश्किल से हो रही थी। उसके पास रहने को न कोई घर था, न पत्नी थी और न ही बच्चे थे। सिर्फ़ एक चादर और एक तकिया ही उसकी कुल संपत्ति थी। जब रात होती, तो वह एक बंद पड़े स्कूल के बाहर अपनी चादर बिछाता, तकिया रखता और सो जाता। एक दिन सुबह के समय गाँव में अचानक बाढ़ आ गई। जब उसकी आँख खुली तो हर तरफ़ चीख-पुकार और शोर-शराबा मचा हुआ था। वह उठा और स्कूल के पास बनी पानी की टंकी पर चढ़ गया; वहाँ उसने चादर बिछाई, दीवार के सहारे तकिया लगाया और आराम से लेटकर लोगों को देखने लगा। लोग अपना सामान और घर की क़ीमती चीज़ें लेकर भाग रहे थे; कोई नक़दी लेकर भाग रहा था, कोई जेवर, कोई अपनी बकरियां तो कोई कुछ और क़ीमती सामान लेकर भाग रहा था। इसी दौरान एक शख़्स भागता हुआ आ रहा था, जिसने सोने के जेवर, पैसे और कपड़े उठा रखे थे। जब वह शख़्स उस नाई के पास से गुज़रा और उसे इतनी शांति से लेटे हुए देखा, तो ग़ुस्से में तमतमाकर बोला: "ओए! हमारी सारी उम्र की कमाई उजड़ गई है, यहाँ जान पर बनी हुई है और तू टांगें पसार कर सो रहा है!" यह सुनकर नाई ने बड़े सुकून से कहा: "जनाब, आज ही तो ग़रीबी का असली मज़ा मिला है!" जब मैंने यह कहानी सुनी तो पहले तो हँस पड़ा, मगर फिर मेरे दिल में एक ख़याल आया कि शायद क़यामत के दिन (रोज़-ए-महशर) का मंज़र भी कुछ ऐसा ही होगा। जब तमाम इंसानों से पाई-पाई का हिसाब लिया जाएगा। एक तरफ़ ग़रीबों का हिसाब हो रहा होगा: सिर्फ़ दो वक़्त की रोटी, कपड़ा, अल्लाह के हक़ (حقوق اللہ) और बंदों के हक़ (حقوق العباد)। दूसरी तरफ़ अमीरों का हिसाब हो रहा होगा: उनके प्लाज़ा, दुकानें, फैक्ट्रियां, गाड़ियाँ, बंगले, सोना-चांदी, नौकर-चाकर, बेहिसाब पैसा, हलाल-हराम की कमाई, ऐश-ओ-आराम, ज़कात, अल्लाह के हक़ और बंदों के हक़। इतनी सारी चीज़ों का हिसाब-किताब देते हुए अमीर लोग पसीने से सराबोर होंगे और ख़ौफ़ के मारे थर-थर काँप रहे होंगे। तब शायद इसी नाई की तरह ग़रीब लोग उन अमीरों को देख रहे होंगे, जिनके चेहरों पर एक अजीब सा सुकून होगा और शायद वे दिल ही दिल में कह रहे होंगे: "आज ही तो ग़रीबी का असली मज़ा मिला है।" अल्लाह तआला से दुआ है कि वह हमें अपनी हर-एक नेमत का शुक्र अदा करने की और उसे अल्लाह की रज़ा (मर्ज़ी) के मुताबिक़ इस्तेमाल और तक़सीम (वितरित) करने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन या रब्बल आलमीन! (मन्क़ूल — चयन: इस्लामिक ट्यूब प्रो ऐप)

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