عربی دوم

علم التصریف
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نوادر النحو فی حل ھدایۃ النحو
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تمرین المنطق
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تفہیم قطبی (اساتذہ و طلبہ کے لیے یکساں مفید)
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تسہیل المنطق
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کتاب الصرف جلد ۲
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کتاب الصرف جلد ۳
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کتاب النحو جلد ۲
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کتاب النحو جلد ۳
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हज़रत मौलाना हुसैन अहमद मदनी की बेमिसाल इस्तिक़ामत (दृढ़ता)

हज़रत मौलाना हुसैन अहमद मदनी की बेमिसाल इस्तिक़ामत (दृढ़ता)

एक बार हज़रत मौलाना हुसैन अहमद मदनी (रह.) पर ग़द्दारी (राजद्रोह) का मुक़दमा चला और फ़िरंगी (अंग्रेज़) की अदालत हॉल कराची में उनकी पेशी हुई। मौलाना मोहम्मद अली जौहर और बहुत सारे दूसरे अकाबरीन (वरिष्ठ नेता) भी वहाँ जमा थे। फ़िरंगी ने बुलाया और कहा, "हुसैन अहमद! यह जो तुमने फ़तवा दिया है कि अंग्रेज़ की फ़ौज में शामिल होना हराम है, इसकी इजाज़त नहीं है। तुम्हें पता है कि इसका नतीजा क्या होगा?" हज़रत ने फ़रमाया, "हाँ, मुझे पता है कि इसका नतीजा क्या है।" उसने पूछा, "क्या नतीजा है?" हज़रत के कंधे पर एक सफ़ेद चादर थी। हज़रत ने उसकी तरफ़ इशारा करके फ़रमाया, "यह इसका नतीजा है।" फ़िरंगी ने कहा, "क्या मतलब?" फ़रमाया, "यह कफ़न है। मैं अपने साथ लेकर आया हूँ ताकि तुम अगर मुझे फाँसी भी दे दोगे तो कफ़न मेरे पास होगा।" मौलाना मोहम्मद अली जौहर ने हज़रत के पाँव पकड़ लिए और अर्ज़ किया, "हज़रत! थोड़ा सा ज़ू-मायनी (द्विअर्थी/अस्पष्ट) सा जवाब दे दें जिससे आप बच जाएँ, क्योंकि हमें आपकी बड़ी ज़रूरत है। आप हमारे सर का ताज हैं, आप जैसे अकाबिर हमें फिर नहीं मिलेंगे।" मगर हज़रत मदनी (रह.) की उस वक़्त अजीब शान थी। सुब्हानअल्लाह! फ़िरंगी कहने लगा, "हुसैन अहमद! तुम्हें कफ़न लाने की क्या ज़रूरत थी? जिसे हुकूमत (सरकार) फाँसी दे, उसे कफ़न भी हुकूमत ही देती है।" हज़रत मदनी (रह.) ने फ़रमाया, "अगरचे (हालॉंकि) कफ़न हुकूमत देती है, लेकिन मैं अपना कफ़न इसलिए लाया हूँ क्योंकि फ़िरंगी के दिए हुए कफ़न में मुझे अल्लाह के हुज़ूर जाते हुए शर्म आती है। मैं क़ब्र में तुम्हारा कफ़न भी लेकर जाना नहीं चाहता।" हमारे अकाबिर क्या इस्तिक़ामत (दृढ़ता) के पहाड़ थे! अल्लाहू अकबर। शजरा-ए-नसब (वंश) से हुसैन अहमद मदनी सैय्यद हैं... और हुसैन बिन अली (रज़ियल्लाहु तआला अन्हुमा) की औलाद में से हैं।

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