عربی دوم

ثمرۃ النجاح شرح اردو نور الایضاح ۲
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ثمرۃ النجاح شرح اردو نور الایضاح ۱
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مفتاح العربیہ جلد-2
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شرح اردو القراءۃ الواضحۃ 2
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درس ہدایت النحو
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شرح ہدایت النحو
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ارشاد النحو شرح اردو ہدایت النحو
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اشرف الایضاح شرح اردو نور الایضاح
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مفتاح العربیہ دوم
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गिलास मत बने रहो बल्कि झील बन जाओ

गिलास मत बने रहो बल्कि झील बन जाओ

एक नौजवान अपनी ज़िंदगी के मामलात से काफ़ी परेशान था। एक रोज़ एक दरवेश से मुलाक़ात हो गई तो अपना हाल कह सुनाया। कहने लगा कि बहुत परेशान हूँ। यह दुख और परेशानियाँ अब मेरी बर्दाश्त से बाहर हैं। लगता है शायद मेरी मौत ही मुझे इन ग़मों से निजात दिला सकती है। दरवेश ने उसकी बात सुनी और कहा, "जाओ और नमक लेकर आओ।" नौजवान हैरान तो हुआ कि मेरी बात का नमक से क्या ताल्लुक़, पर फिर भी ले आया। दरवेश ने कहा, "पानी के गिलास में एक मुट्ठी नमक डालो और इसे पी लो।" नौजवान ने ऐसा ही किया तो दरवेश ने पूछा, "इसका ज़ायक़ा (स्वाद) कैसा लगा?" नौजवान थूकते हुए बोला, "बहुत ही ख़राब, एकदम खारा!" दरवेश मुस्कुराते हुए बोला, "अब एक मुट्ठी नमक लेकर मेरे साथ इस सामने वाली झील तक चलो।" साफ़ पानी से बनी उस झील के सामने पहुँच कर दरवेश ने कहा, "चलो अब इस मुट्ठी भर नमक को पानी में डाल दो और फिर इस झील का पानी पियो।" नौजवान पानी पीने लगा, तो दरवेश ने पूछा, "बताओ इसका ज़ायक़ा कैसा है, क्या अब भी तुम्हें यह खारा लग रहा है?" नौजवान बोला, "नहीं, यह तो मीठा है। बहुत अच्छा है।" दरवेश नौजवान के पास बैठ गया और उसका हाथ थामते हुए बोला: "हमारे दुख बिल्कुल इसी नमक की तरह हैं। जितना नमक गिलास में डाला था, उतना ही झील में डाला है। मगर गिलास का पानी कड़वा हो गया और झील के पानी को मुट्ठी भर नमक से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा। इसी तरह इंसान भी अपने-अपने ज़र्फ़ (क्षमता/पात्रता) के मुताबिक़ तकलीफ़ों का ज़ायक़ा महसूस करते हैं। जब तुम्हें कोई दुख मिले तो ख़ुद को बड़ा कर लो, गिलास मत बने रहो बल्कि झील बन जाओ। अल्लाह तआला किसी पर उसकी हिम्मत से ज़्यादा बोझ नहीं डालते। इसलिए हमें हमेशा यक़ीन रखना चाहिए कि जितने भी दुख आएँ, हमारी बर्दाश्त से बढ़कर नहीं होंगे..." ــــــــــــــــــــــــــ📝📝ــــــــــــــــــــــــــ मनक़ूल (उद्धृत)। चयन: इस्लामिक ट्यूब प्रो ऐप

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