عربی سوم

تھذیب خلاصۃ الدلائل و تنقیح المسائل فی شرح القدوری و معہ حاشیۃ غایۃ المسائل
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تنقیح الحواشی لحل اصول الشاشی
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اوضح التسہیل لشرح ابن عقیل جلد ۱
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اوضح التسہیل لشرح ابن عقیل جلد ۲
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ارشاد الحواشی شرح اردو اصول الشاشی
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تقریب التہذیب شرح شرح تہذیب (مفتی حبیب اللہ صاحب)
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اشرف الادب مترجم و شرح اردو نفحۃ العرب
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غایة التحقیق شرح کافیہ
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تعلیل القران
تعلیل القران

हे ईश्वर! मेरा नूर मुझे लौटा दे!!

हे ईश्वर! मेरा नूर मुझे लौटा दे!!

(नोट: इस घोषणापत्र के संबोधित व्यक्ति केवल शरिया विज्ञान (उलूम-ए-शरीयत) के छात्र हैं।) आरिफ़ों (अल्लाह की पहचान रखने वालों) ने शरिया के ज्ञान को इस तरह परिभाषित किया है कि यह अल्लाह का नूर (प्रकाश) है जो बंदे के सीने में रोशन हो जाता है। यह नूर दिल में चिराग की लौ की तरह पूरी तरह महसूस होता है। बल्कि छात्र तो इसी चिंता में अपनी जिंदगी घुला देता है कि यह नूर बुझ न जाए! मालिक बिन दीनार (रहमतुल्लाह अलैह) के इस कथन का यही अर्थ है कि "अमल (अमल करने) के लिए हासिल किया गया ज्ञान बंदे को तोड़कर रख देता है!" छात्र बहुत से गुनाहों से सिर्फ इसलिए दूर रहता है कि मेरा नूर मुझसे छिन न जाए। कई बार एक हराम नज़र लंबे समय तक दिल को अंधकारमय कर देती है। दिल अल्लाह से जुड़ाव की मिठास से वाकिफ़ होने के बावजूद कोई प्रेरणा नहीं पाता, लकवाग्रस्त हो जाता है, उसे ग्रहण लग जाता है। कई बार हंसी-मजाक और ठहाकों की महफ़िल लंबी हो जाए, तो बैठे-बैठे दिल अचानक बंद हो जाता है। जैसे हवा के तेज झोंके से चिराग बुझ जाता है। अगर पूरी नीयत के साथ ज़िक्र और तिलावत के ज़रिए इसे फिर से रोशन न किया जाए, तो वह बंद ही रह जाता है। बहस और विवाद भी ज्ञान का नूर छीन लेते हैं। इंसान किसी बेनतीजा बहस में उलझ जाए, तो दिल बाकायदा सख्त हो जाता है। कुछ देर के लिए नमाज़ का खुशू (एकाग्रता) और मुनाजात (अल्लाह से चुपके से दुआ करने) का आनंद रूठ जाता है। बल्कि मैंने देखा है कि कभी माता-पिता के सामने आवाज़ ऊंची हो जाए, तो अचानक दिल जैसे मर सा जाता है! एक घबराहट और वीरानी छा जाती है। मानो एक ही पल में ज्ञान के सारे पुलिंदे वजूद से अलग होकर घूर रहे हों कि यह क्या कर दिया?! दिल की दुनिया को अंधेरा करने के लिए दुनिया की चकाचौंध से बढ़कर कोई चीज़ नहीं है। कई बार तो दुनियावालों की ठाठ-बाहर की तरफ नज़र उठाने से ही अंतर्दृष्टि (बसीरत) चौंधिया जाती है। तो फिर उस छात्र का क्या हाल होगा जिसका उठना-बैठना ही उन लोगों में होता है जिनके दिल दुनिया की मोहब्बत से लबालब भरे होते हैं, और जिनकी बातों का केंद्र केवल दुनिया होती है?! कभी ज्ञानवालों से पूछकर देखिए कि बा-जमात (सामूहिक) नमाज़ छूट जाने पर उन पर क्या गुज़रती है?! क्या दुनिया बेगानी सी नहीं हो जाती?! खाना बेस्वाद हो जाता है। कदम भारी हो जाते हैं। दोस्तों की महफ़िल बोझ बन जाती है। जब तक कि इंसान अपने रब के सामने गिड़गिड़ा न ले कि 'मौला! मेरा नूर मुझे लौटा दे!!' और यह तौफ़ीक (अवसर/प्रेरणा) भी अल्लाह ही की तरफ से होती है। इमाम शाफ़ई (रहमतुल्लाह अलैह) जब इमाम मालिक (रहमतुल्लाह अलैह) के सामने शागिर्द (छात्र) बनकर बैठे, तो उस्ताद ने फ़रमाया: "मुझे लगता है कि अल्लाह ने तुम्हारे सीने में ज्ञान का नूर रोशन कर दिया है, देखो! गुनाहों के अंधेरे से इसे बुझने मत देना!" और हम में से बहुत से लोगों के नूर बुझ चुके हैं, लेकिन हमें इसका एहसास नहीं है। हम ज्ञान की दुकान के बाहर लगी बेजान मूर्तियां हैं। और क्या! सहल अल-तुस्तरी (रहमतुल्लाह अलैह) एक नूरानी बात कह गए हैं: "उस दिल में नूर का दाखिल होना हराम है, जिसमें कोई ऐसी चीज़ हो जिससे अल्लाह अज़्वजल नफ़रत करता हो!" हराम है कि उस दिल में नूर दाखिल हो जाए जिसमें अंधेरा हो! जिसमें दुनिया की मोहब्बत हो! जो गैर-महरम से रिश्ता कायम करता हो! जिसे अल्लाह की मख्लूक (सृष्टि) पर ज़ुल्म की मनहूसियत ने काला कर दिया हो! जिसका 'मैं' (अहंकार) का डंक निकला न हो! ... छात्र को चाहिए कि वह हर समय चिंतित रहे कि कहीं मेरा नूर मुझसे छिन न जाए। इस चिंता को अपना रोग (गहन फिक्र) बना ले। निश्चित रूप से उसे बहुत से शौक छोड़ने पड़ेंगे, कई संगतों को अलविदा कहना पड़ेगा, कई व्यवहारों पर पुनर्विचार करना पड़ेगा। फिर शायद वह शुरुआती पूर्वजों (सलफ़-ए-अवाइल) की इस बात का कुछ प्रतीक बन जाए कि: "हम में से जब कोई ज्ञान हासिल करता था, तो वह ज्ञान उसकी चाल-ढाल और व्यवहार में दिखाई देने लगता था।" हे आसमानों और ज़मीन के नूर! हमारे लिए हमारे नूर को पूरा (मुकम्मल) कर दे और हमें माफ़ कर दे! ___________📝📝___________ नक़ल किया गया (साभार)। इस्लामिक ट्यूब प्रो ऐप से चयनित।

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