عربی سوم

الجوہرۃ النیرۃ شرح مختصر القدوری 2
الجوہرۃ النیرۃ شرح مختصر القدوری 2
الجوہرۃ النیرۃ شرح مختصر القدوری 1
الجوہرۃ النیرۃ شرح مختصر القدوری 1
شرح اردو القراءۃ الواضحۃ 3
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इमाम मोहम्मद (रह.) का इल्मी शौक़ और शब-बेदारी / इमाम मोहम्मद (रह.) का इल्मी शऊर

इमाम मोहम्मद (रह.) का इल्मी शौक़ और शब-बेदारी / इमाम मोहम्मद (रह.) का इल्मी शऊर

इमाम मोहम्मद (रह.) के नाम से कौन नावाक़िफ़ (अपरिचित) है, इन्हीं की किताबों ने हनफ़ी फ़िक़्ह को मुदव्वन (मूर्तरूप/कोडीफाइड) किया, मसलों के दलायल (प्रमाण) जमा किए, इख़्तेलाफ़ी अक़्वाल (मतभेदों) का ज़िक्र किया और दुनिया के अक्सर (अधिकांश) ख़ित्तों (क्षेत्रों) में रायज (प्रचलित) फ़िक़्ह-ए-हनफ़ी को तस्नीफ़्री शक्ल (लिखित रूप) में उम्मत-ए-मुस्लिमा के सामने पेश करने की सआदत (सौभाग्य) हासिल की। मुताला (अध्ययन) उनकी तबियत-ए-सानिया (दूसरी आदत) बन चुका था, इल्म (ज्ञान) ही उनका ओढ़ना-बिछौना था और इसी में वह मुनहमक (लीन) रहते, किताबों का ढेर गिर्द-ओ-पेश (आस-पास) लगा रहता, रात सोते नहीं थे, तश्त (बर्तन) में पानी रखा रहता, नींद आती तो पानी से ज़ायल (दूर) करते, एक मौज़ू (विषय) से उकता जाते, तो दूसरा शुरू कर देते। (1) मुझे डरा नहीं सकती फ़ज़ा की तारीकी मरी सरिश्त में है पाकी व दरख़्शानी तो ऐ मुसाफ़िर-ए-शब! ख़ुद चराग़ बन अपना कर अपनी रात को दाग़-ए-जिगर से नूरानी लोगों ने इस शब-बेदारी (रात को जागने) की वजह पूछी तो फ़रमाने लगे: "मैं कैसे सो रहूँ जबकि आम मुसलमान हम पर एतमाद (भरोसा) करके सो रहे हैं कि हम उनकी रहनुमाई (मार्गदर्शन) करेंगे।" (2) घर वालों से कह रखा था कि दुन्यवी ज़रूरतों के सिलसिले में मुझसे बात न करें। इस बारे में मेरे वकील से कह दिया करें, ताकि मेरे इल्म व मुताले की यकसूई (एकाग्रता) में ख़लल (बाधा) न आए। (4) इल्म व मुताले की यकसूई में इमकान भर (संभव) कोशिश करते कि कोई मख़िल (बाधक) न हो, उनके घर में एक मुर्ग़ (मुर्गा) था जिसकी बांग किसी वक़्त की पाबंद न थी, किसी भी वक़्त जी चाहता नालां (चिल्लाने) हो जाता, इमाम ने एक दिन पकड़ कर यह कहते हुए ज़ब्ह किया कि यह ख़्वामख़्वाह मेरे इल्म व मुताले में मख़िल बना हुआ है। फ़रमाते थे: लज़्ज़ातुल अफ़कार ख़ैरुन मिन लज़्ज़ातिल अब्कार (5) "फ़िक्र व नज़र की लज़्ज़तों के सामने दोशीज़ाओं (कुमारियों) की लज़्ज़तें कुछ भी नहीं।" इमाम मोहम्मद (रह.) ने नौ सौ निन्यानबे (999) किताबें लिखीं। (6) इमाम अहमद बिन हम्बल (रह.) से पूछा गया कि ये दक़ीक़ (जटिल) मसाइल आपको कहाँ से हासिल हुए? फ़रमाने लगे, "मोहम्मद बिन अल-हसन की किताबों से।" (7) इमाम मोहम्मद (रह.) ने जो मसाइल क़ुरआन व सुन्नत और इज्मा से मुस्तम्बित (निकाले/व्युत्पन्न) किए उनकी तादाद दस लाख सत्तर हज़ार एक सौ (1,070,100) बताई गई है। (8) हारून रशीद के साथ "रे" (शहरी क्षेत्र) की तरफ गए, वहीं इंतक़ाल फ़रमाया, उसी दिन मशहूर नह्वी (व्याकरणशास्त्री) इमाम कसाई का भी इंतक़ाल हुआ, दफ़्न करने के बाद हारून रशीद ने कहा: दफ़न्ना अल-याोम अल-लुग़ता वल-फ़िक़्ह - "आज हमने लुग़त (भाषा) और फ़िक़्ह (न्यायशास्त्र) दोनों को दफ़्न कर दिया।" आपकी वफ़ात 189 हिजरी में हुई। उम्र-ए-अज़ीज़ की 58 बहारें देखनी नसीब हुईं। (10) ------------------------------------------------------- (1) मिफ़्ताहुस सआदत, जिल्द 1, पृष्ठ 23 (2) मनाक़िबे कुर्दी, पृष्ठ 436 (4) देखिए तारीख़ बग़दाद, जिल्द 4, पृष्ठ 176 (5) हदाइकुल हनफ़िया, पृष्ठ 76 (6) अल-जवाहिरुल मुज़िय्या, जिल्द 1, पृष्ठ 76 (7) देखिए सियर अ'लाम अन-नुबला, जिल्द 9, पृष्ठ 136 (8) हदाइकुल हनफ़िया, जिल्द 4, पृष्ठ 130 (10) देखिए तारीख़ बग़दाद, जिल्द 2, पृष्ठ 181, तथा अल-अ'लाम लिज्ज़रकली, जिल्द 6, पृष्ठ 80 ------------------------------------------------------- किताब: मताअ-ए-वक़्त और कारवान-ए-इल्म (पृष्ठ संख्या 156 से 158) लेखक: इब्नुल हसन अब्बासी (रह.) नक़ल कर्ता: इस्लामिक ट्यूब प्रो ऐप अधिक मूल्यवान लेखों के लिए हमारे व्हाट्सएप चैनल को फ़ॉलो करें।

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