عربی چھارم

تسہیل الحقائق شرح اردو کنز الدقائق جلد ٢
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تعلیل القران
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طریق السالکین شرح اردو ریاض الصالحین جلد ١
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طریق السالکین شرح اردو ریاض الصالحین جلد ٢
طریق السالکین شرح اردو ریاض الصالحین جلد ٢
طریق السالکین شرح اردو ریاض الصالحین جلد ٣
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سوال باسولی حاشیہ شرح ملا جامی
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درسی تقریر براۓ شرح ملا جامی
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التسہیل السّامی فی حل شرح الجامی
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خلاصة الجامی شرح اردو شرح ملا جامی
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बुद्धिमान और बुद्धिमानी

बुद्धिमान और बुद्धिमानी

कुछ दिन पहले दांत में गंभीर दर्द था, मैं फ़ौरन डॉक्टर के पास गया। पहले तो पता चला कि लिस्ट पूरी हो चुकी है और डॉक्टर इससे ज़्यादा मरीज़ों को चेक नहीं करते। बहुत मिन्नत-समाजत के बाद बड़ी मुश्किल से आख़िर में नंबर मिल गया। डॉक्टर ने चेक किया और पहले तो दांत में कुछ इंजेक्शन लगाए, फिर एक प्लास (pliers) जैसी कोई चीज़ हाथ में ली। विभिन्न प्रकार के औजारों और चीज़ों की मदद से मसूड़ों और दांत के साथ पूरी जंग करता रहा और मैं दर्द की शिद्दत (तीव्रता) के कारण कभी कुर्सी को ज़ोर से पकड़ता तो कभी ऊपर-नीचे होता, आँखों में पानी भी जमा हो गया...... लेकिन मैंने अपने आप से सवाल किया कि: क्यों यह सब बर्दाश्त कर रहा हूँ? क्यों विरोध नहीं कर रहा हूँ? क्यों डॉक्टर को तोहफे के तौर पर कुछ गालियां नहीं दे रहा हूँ? क्यों डॉक्टर को थप्पड़ नहीं मार रहा हूँ? बल्कि बाद में उसका शुक्रिया भी अदा कर रहा था और पूछ रहा था कि दोबारा कब आऊँ, ऊपर से इस सारे काम के डॉक्टर को पैसे भी दिए! कुछ देर तो सोचता रहा_______ फिर अचानक मुझे अपने आप से शर्म और ख़ुदा से शर्मिंदगी महसूस होने लगी, जब मेरे अंदर से आवाज़ आई कि "ख़ान साहब, क्या ख़ुदा को इस डॉक्टर के बराबर ही मानते हो...?" डॉक्टर पर आपत्ति नहीं करते क्योंकि पता है कि इस सारे दर्द, इंजेक्शन, प्लास और दूसरे औजारों में इस तकलीफ़ का एक दर्शन और हिकमत (बुद्धिमत्ता) है और आख़िर में हमारा अपना ही फ़ायदा है। तो ख़ुदा तो हिकमत का ख़ालिक़ (बनाने वाला) और मालिक है! यहाँ तक कि पहले तो डॉक्टर को 'हकीम' ही कहते थे और ख़ुदा तो सबसे बड़ा हकीम (Al-Hakim) है। इसलिए याद रखें उसके काम भी हिकमत से खाली नहीं। अगर कोई दर्द, मुश्किल या इम्तिहान हमारी तरफ आए तो ख़ुदा की हिकमत पर भरोसा करें, उसका शुक्रिया अदा करें और पूछें, "ख़ुदाया, दोबारा हमारी बारी कब है?" 💐💐 मुझे भी दर्द की हिकमत उस वक़्त पता चली जब किसी ने बताया कि कैंसर के लाइलाज होने की एक वजह यह है कि इसमें (शुरुआत में) दर्द नहीं होता, और जब पता चलता है तो उस वक़्त काफ़ी देर हो चुकी होती है। इंसान डॉक्टर की समझ, डिग्री और उसके अनुभव पर यक़ीन रखता है। डॉक्टर का जितना ज़्यादा अनुभव होता है, उतना ही ज़्यादा भरोसा होता है। बकायदा क्लिनिक के बाहर लिखा होता है: अनुभव २० साल का, ४० साल का, ६० साल का...... जबकि ख़ुदा का 'तजुर्बा' (ज्ञान व सत्ता) तो अरबों सालों से है, बल्कि यूँ कहूँ तो बेहतर है कि हमेशा से है और हमेशा रहेगा। हाँ याद आया कि अल्लामा इक़बाल को भी तो 'हकीम-उल-उम्मत' कहते हैं क्योंकि उन्होंने उम्मत के दर्दों का सही इलाज बताया था। लेकिन हम लोगों को तो अस्थायी (temporary) रूप से डिस्प्रिन या ब्रूफेन चाहिए जो थोड़ी देर के लिए इस दर्द को दूर कर दे, चाहे वक़्त गुज़रने के साथ-साथ पूरे बदन को ही ख़राब क्यों न कर दे।

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