عربی پنجم

الفوز الکبیر فی اصول التفسیر اردو
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الفوز الکبیر فی اصولِ التفسیر
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الحسامي
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المقامات الحریریۃ
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تلخیص المفتاح
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شرح فتح القدیر
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مبادیٔ الفلسفہ
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معین الفلسفہ
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مرقاۃ المفاتیح شرح مشکوٰۃ المصابیح جلد 7
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हज़रत हकीम-उल-इस्लाम क़ारी मोहम्मद तय्यब साहब रहमतुल्लाह अलैह, "नाश्तह" (नाश्ता) और एक बंगाली छात्र

हज़रत हकीम-उल-इस्लाम क़ारी मोहम्मद तय्यब साहब रहमतुल्लाह अलैह, "नाश्तह" (नाश्ता) और एक बंगाली छात्र

डॉ. ताबिश मेहदी अपनी आत्मकथा में लिखते हैं, हमारे बुज़ुर्ग दोस्त स्वर्गीय मुफ्ती अब्दुल रऊफ मुंसिफ मुबारकपुरी ने अपने छात्र जीवन की एक घटना एक से अधिक बार सुनाई थी। उन्होंने बताया था कि चूंकि दारुल उलूम देवबंद में नाश्ते की व्यवस्था कभी नहीं रही है, इसलिए जो छात्र नाश्ता करना चाहते हैं, वे अपने-अपने स्तर पर नाश्ते की व्यवस्था करते हैं। जिन छात्रों की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं होती, वे केवल दोपहर और रात के भोजन पर ही निर्भर रहते हैं। मुफ्ती साहब के एक बंगाली साथी ने मोहतमिम (कुलपति) साहब के नाम एक आवेदन लिखा। उसका विषय कुछ इस प्रकार था: "हज़रत! मैं बंगाल का एक छात्र हूँ और दारुल उलूम में 'मोक़ूफ अलैह' कक्षा में पढ़ रहा हूँ। दारुल उलूम में नाश्ते का कोई इंतज़ाम नहीं है। मेरी स्थिति ऐसी नहीं है कि मैं अपने स्तर पर सुबह के नाश्ते की व्यवस्था कर सकूँ। घर पर तो मैं रात की सूखी-रूखी रोटी खाकर काम चला लिया करता था। मदरसे में अच्छे अंक प्राप्त करता रहा हूँ और अल्हम्दुलिल्लाह, दारुल उलूम में भी मेरी शैक्षणिक स्थिति अच्छी है, अच्छे अंक लाता हूँ और साथियों के साथ मुकाबला रहता है। लेकिन दोपहर तक बिना कुछ खाए-पिए पढ़ना मेरे लिए बेहद मुश्किल है, इसका असर मेरी पढ़ाई पर भी पड़ सकता है। यदि हज़रत वाला मेरे लिए नाश्ते की कोई व्यवस्था कर दें तो बड़ी कृपा होगी, मेरी शिक्षा भी पूरी हो जाएगी और मेरे अंकों में भी कोई कमी नहीं आएगी।" वह छात्र इस विषय का आवेदन कार्यालय के क्लर्क (मुंशी) को देकर आ गया। जब हज़रत मोहतमिम साहब तशरीफ़ लाए और आवेदन देखा तो मुस्कुराए, और एक चपरासी के ज़रिए उस छात्र को बुलवाया। वह आया और सलाम करके खड़ा हो गया। हज़रत क़ारी साहब ने कुछ देर बाद सिर उठाया और पूछा, "क्या यह आवेदन आपका है?" उसने कहा, "जी हज़रत!" हज़रत क़ारी साहब ने फरमाया, "आपकी योग्यता और क्षमता का हाल यह है कि आप नाश्ता उर्दू के अक्षर 'ते' (ت) के बजाय 'तोए' (ط) से 'नाश्तह' (ناشطہ) लिखते हैं। लेकिन छूट इतनी बड़ी चाहते हैं कि दारुल उलूम के नियम और क़ायदे के ख़िलाफ़ आपके साथ विशेष व्यवहार किया जाए।" हज़रत क़ारी साहब की यह आलोचनात्मक बात सुनकर वह छात्र तुरंत बिना किसी झिझक के मुखातिब हुआ और कहा, "हज़रत! क्या आप नाश्ता 'ते' (ت) से लिखते हैं?" फिर थोड़े से ठहराव के बाद बोला, "सही शब्द तो 'तोए' (ط) से 'नाश्तह' (ناشطہ) ही है, क्योंकि यह इंसान में 'निशात' (ऊर्जा/चुस्ती) पैदा करता है। सुबह का यह नाश्ता दिनभर इंसान को चुस्त-दुरुस्त और फुर्तीला रखता है। अगर नाश्ता 'ते' (त) से लिखना आम हो गया है, तो इसमें सुधार होना चाहिए।" क़ारी साहब ने एक हल्की मुस्कान के बाद उसे विदा किया और दफ्तर के मुंशी से कहा, "मुंशी जी! भले ही दारुल उलूम में नाश्ते की कोई व्यवस्था नहीं है, लेकिन इस छात्र की हाज़िर-जवाबी और बुद्धिमानी को देखते हुए, मेरे खाते से इसे हर महीने नाश्ते के बराबर की रकम दी जाती रहे।" (तेज़ धूप का मुसाफ़िर / डॉ. ताबिश मेहदी / 247 — मनक़ूल - साभार: इस्लामिक ट्यूब प्रो ऐप)

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