عربی پنجم

اشرف الھدایہ جلد 6
اشرف الھدایہ جلد 6
اشرف الھدایہ جلد 7
اشرف الھدایہ جلد 7
تشریح السراجی
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درس سراجی
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معین السراجی
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تسہیل السراجی
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العقائد النسفیۃ علی شرح العقائد
العقائد النسفیۃ علی شرح العقائد
فیض سبحانی شرح اردو حسامی 2
فیض سبحانی شرح اردو حسامی 2
الحسامی
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क्या पत्नी पर सास की सेवा करना वाजिब (अनिवार्य) है?

क्या पत्नी पर सास की सेवा करना वाजिब (अनिवार्य) है?

शेख मोहम्मद रावी से एक औरत ने सवाल पूछा कि उनके शौहर की वालिदा (माँ) बीमार रहती हैं। शौहर तक़ाज़ा (मांग) करता है कि मैं उनकी माँ की ख़िदमत (सेवा) करूँ और मुझसे यह सब नहीं होता। क्या मुझ पर शौहर की माँ की ख़िदमत वाजिब (अनिवार्य) है? शेख ने जवाब दिया, "नहीं, तुझ पर शौहर की माँ की ख़िदमत हरगिज़ वाजिब नहीं है, हाँ अलबत्ता तुम्हारे शौहर पर वाजिब है कि वह अपनी माँ की ख़िदमत करे।" फिर शेख ने तीन हल (समाधान) पेश किए: पहला हल: वालिदा को घर लेकर आएँ और दिन-रात आपके शौहर और उनके बच्चे अपनी माँ और दादी की ख़िदमत करें, उन पर यह वाजिब है; याद रखें आप पर वाजिब नहीं है। दूसरा हल: वालिदा को अलग घर में रखें और उनकी देखभाल, ख़िदमत और ख़बरगिरी (हाल-चाल लेने) के लिए वह वहाँ जाता रहे। अगर वालिदा यह तक़ाज़ा करे कि रात उनके सरहाने गुज़ारे, तो माँ के पास रात रुकना उन पर वाजिब है; याद रखें आप पर वाजिब नहीं है। तीसरा हल: वालिदा की देखभाल के लिए एक नर्स रख लें। अगर नर्स को तनख़्वाह देने में दिक़्क़त हो, तो घर के अख़राजात (खर्च) कम करके नर्स की तनख़्वाह दें। नर्स की मौजूदगी में वालिदा के पास आते-जाते फ़िट्ने (बुराई/प्रलोभन) में पड़ने का ख़तरा हो, तो नर्स से शादी करना वाजिब होगा। इस तरह वह तीन नेकियों को जमा करेगा: दूसरी शादी का अज्र (पुण्य), माँ की ख़िदमत का अज्र और फ़िट्ने से बचने का अज्र। अलबत्ता आप पर शौहर की माँ की ख़िदमत वाजिब नहीं है, लिहाज़ा आप इज़्ज़त के साथ अपने घर रुकी रहें। कुछ देर सोचने के बाद औरत बोली, "शेख साहब! शौहर की माँ भी मेरी माँ जैसी है, वाजिब नहीं तो मुस्तहब (पसंदीदा/पुण्य कार्य) ही सही, मैं ख़ुद उनकी ख़िदमत करूँगी।" मनक़ूल (उद्धृत)।

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