عربی ششم

مرقاۃ المفاتیح شرح مشکوٰۃ المصابیح جلد 5
مرقاۃ المفاتیح شرح مشکوٰۃ المصابیح جلد 5
مرقاۃ المفاتیح شرح مشکوٰۃ المصابیح جلد 6
مرقاۃ المفاتیح شرح مشکوٰۃ المصابیح جلد 6
مرقاۃ المفاتیح شرح مشکوٰۃ المصابیح جلد 8
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مرقاۃ المفاتیح شرح مشکوٰۃ المصابیح جلد 9
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مرقاۃ المفاتیح شرح مشکوٰۃ المصابیح جلد ۱۰
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مرقاةالمفاتیح الجزءالحادی عشر
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درسِ مشکوۃ جلد 1
درسِ مشکوۃ جلد 1
درسِ مشکوۃ جلد 2
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درسِ مشکوۃ جلد 3
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इतिहास की सबसे शक्तिशाली माफ़ी (हज़रत अबू ज़र और हज़रत बिलाल का वाक़िया)

इतिहास की सबसे शक्तिशाली माफ़ी (हज़रत अबू ज़र और हज़रत बिलाल का वाक़िया)

जब हज़रत अबू ज़र (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने हज़रत बिलाल (रज़ियल्लाहु अन्हु) को कहा... "ऐ काली-कलूटी माँ के बेटे! अब तू भी मेरी ग़लतियाँ निकालेगा...?" बिलाल यह सुनकर ग़ुस्से और अफ़सोस से बेक़रार होकर यह कहते हुए उठे, "ख़ुदा की क़सम! मैं इसे ज़रूर ब-ज़रूर अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के सामने उठाऊँगा!!" यह सुनकर अल्लाह के रसूल के चेहरे का रंग बदल गया और आपने इर्शाद फ़रमाया: "अबू ज़र! क्या तुमने उसे माँ की आर (ताना) दिलाई??? तुम्हारे अंदर की जाहिलियत अब तक न गई!!" इतना सुनना था कि अबू ज़र यह कहते हुए रोने लगे, "या रसूलुल्लाह! मेरे लिए दुआ-ए-मग़फ़िरत (क्षमा की प्रार्थना) कर दीजिए।" और फिर रोते हुए मस्जिद से निकले। बाहर आकर अपना रुख़सार (गाल) मिट्टी पर रख दिया और बिलाल से मुख़ातिब होकर कहने लगे: "बिलाल! जब तक तुम मेरे रुख़सार को अपने पाँव से न रौंद दोगे, मैं इसे मिट्टी से नहीं उठाऊँगा, यक़ीनन तुम मोअज्ज़ज़ व मोहतरम (प्रतिष्ठित व सम्मानित) हो और मैं ज़लील व ख़्वार (तुच्छ)!!" यह देखकर बिलाल रोते हुए आए और अबू ज़र के क़रीब होकर उनके रुख़सार को चूम लिया और बेसाख़्ता (भावुक होकर) गोया हुए: "ख़ुदा-ए-पाक की क़सम! मैं इस रुख़सार को कैसे रौंद सकता हूँ, जिसने एक बार भी ख़ुदा को सज्दा किया हो!" फिर दोनों खड़े होकर गले मिले और बहुत रोए!! (सहीह बुख़ारी: 31) और आज हम एक दूसरे की हज़ारों बार दिल-आज़ारी (दिल दुखाना) करते हैं, मगर कोई यह नहीं कहता कि... "भाई! माफ़ करें, बहन! माज़रत (माफ़ी) क़बूल करें"। यह सच है कि हम आए दिन लोगों के जज़बात को छलनी कर देते हैं; मगर हम माज़रत के अलफ़ाज़ (शब्द) तक ज़बान से अदा नहीं करते और "माफ़ कर दीजिए" जैसा एक अदद लफ़्ज़ कहते भी हमें शर्म आती है। माफ़ी माँगना उम्दा संस्कृति (संस्कार) और बेहतरीन अख़लाक़ (आचरण) है, जबकि कई लोग समझते हैं कि यह खुद की बेइज़्ज़ती है। हम सब मुसाफ़िर हैं, और सामान-ए-सफ़र निहायत ही कम है, हम सब दुनिया व आख़िरत में अल्लाह से माफ़ी और दरगुज़र (क्षमा) का सवाल करते हैं। *नोट* इस पैग़ाम को दूसरों तक पहुँचाइए ताकि अल्लाह किसी की ज़िंदगी को आपके ज़रिए बदल दे। मनकूल (नकल किया गया)।

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