عربی ششم

شرح عقیدہ طحاویہ
شرح عقیدہ طحاویہ
طرازی شرح سراجی
طرازی شرح سراجی
تسہیل بیضاوی شرح تفسیر بیضاوی
تسہیل بیضاوی شرح تفسیر بیضاوی
تنویر العینین بشرح تفسیر الجلالین المجلد الاول
تنویر العینین بشرح تفسیر الجلالین المجلد الاول
تنویر العینین بشرح تفسیر الجلالین المجلد الثانی
تنویر العینین بشرح تفسیر الجلالین المجلد الثانی
تنویر العینین بشرح تفسیر الجلالین المجلد الثالث
تنویر العینین بشرح تفسیر الجلالین المجلد الثالث
تنویر العینین بشرح تفسیر الجلالین المجلد الرابع
تنویر العینین بشرح تفسیر الجلالین المجلد الرابع
عقیدۃ الطحاوی مع الحواشی و الزیادات
عقیدۃ الطحاوی مع الحواشی و الزیادات
شرح عقیدہ طحاویہ
شرح عقیدہ طحاویہ

पड़ोसियों का सम्मान और बेमिसाल सादगी:

पड़ोसियों का सम्मान और बेमिसाल सादगी:

हज़रत मौलाना सैयद असग़र हुसैन रहिमतुल्लाह अलैह (जो अपने मिलने वालों में हज़रत मियां साहब के नाम से मशहूर थे) दारुल उलूम देवबंद के उन उस्तादों में से थे जो शोहरत और नाम-ओ-नमूद (دکھاوے) से हमेशा कोसों दूर रहे। उन्होंने जीवन भर इस्लामी उलूम (ज्ञान) की तदरीस (शिक्षण) की सेवा की और हज़ारों छात्रों को अपने ज्ञान से सैराब (तृप्त) किया। आज उपमहाद्वीप (पाक-ओ-हिंद) के शायद ही कोई ऐसे नामचीन उलेमा होंगे जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उनके शागिर्द (छात्र) न हों। उन्होंने कई छोटी-बड़ी किताबें भी लिखी हैं, जिनके विषय अनोखे और भाषा इतनी शानदार है कि आज से सौ साल पहले की तहरीरों (लेखों) में ऐसी बातचीत कम ही मिलती है। ज्ञान और श्रेष्ठता के उच्च स्तर के बावजूद सादगी, विनम्रता और शालीनता का आलम यह था कि देखने वाला उनके ऊंचे मकाम को पहचान ही नहीं पाता था। वह देवबंद (ज़िला सहारनपुर) के एक छोटे से मुहल्ले में रहते थे और उनका मकान कच्चा था। हर साल जब बरसात का मौसम आता, तो यह कच्चा मकान जगह-जगह से गिर जाता था और बरसात गुज़रने के बाद इसकी मरम्मत पर काफी समय और पैसा खर्च करना पड़ता था। हज़रत मौलाना मुफ़्ती मोहम्मद शफ़ी साहब रहिमतुल्लाह अलैह, हज़रत मियां साहब के ख़ास शागिर्द थे, लेकिन विशेष संबंध के कारण हज़रत ने उन्हें अपने साथ बहुत बेतकल्लुफ़ (घनिष्ठ) बना रखा था। एक दिन उन्होंने हज़रत मियां साहब से कहा कि आपको हर साल अपने मकान की मरम्मत करानी पड़ती है, जिससे परेशानी भी होती है, समय भी लगता है और खर्च भी काफी हो जाता है; अगर आप एक बार मकान को पक्का बनवा लें, तो इस रोज़-रोज़ की परेशानी से निजात मिल जाए। हज़रत मियां साहब के मिज़ाज में मज़ाह (विनोदप्रियता) भी बहुत था। उन्होंने मुफ़्ती साहब की यह तजवीज़ (सुझाव) सुनकर शुरू में बड़ी तारीफ़ और ख़ुशी का इज़हार करते हुए फ़रमाया: "वाह मुफ़्ती साहब! आपने कैसी अक़्ल की बात कही, हमने सारी उम्र गुज़ार दी, बूढ़े हो गए और अब तक हमारी अक़्ल में यह बात नहीं आई।" मुफ़्ती साहब फ़रमाते हैं कि हज़रत मियां साहब ने यह बात इतनी बार दोहराई कि मैं शर्म से पानी-पानी हो गया, लेकिन आख़िरकार मैंने अर्ज़ किया कि "हज़रत! मेरा मक़सद तो वह हिकमत (रहस्य) जानना था जिसकी वजह से आपने माली इस्तताअत (आर्थिक क्षमता) के बावजूद अब तक मकान को पक्का नहीं बनवाया, अब मुझे मज़ीद (और) शर्मिंदा करने के बजाय असली वजह बयान फ़रमा दीजिए।" हज़रत मियां साहब शुरू में टालते रहे, लेकिन जब मुफ़्ती साहब (वालिद साहब) ने ज़्यादा इसरार (आग्रह) किया, तो उन्होंने मुफ़्ती साहब का हाथ पकड़कर मकान के दरवाज़े तक ले आए और फ़रमाया: "देखो! इस गली के दाएं-बाएं दोनों तरफ़ देखो, गली के इस सिरे से उस सिरे तक क्या कोई मकान पक्का नज़र आता है?" मुफ़्ती साहब ने कहा, "नहीं।" इस पर मियां साहब ने फ़रमाया: "बताओ, जब मेरे सारे पड़ोसियों के मकान कच्चे हैं, तो पूरी गली में अकेला मैं अपना मकान पक्का बनाकर क्या अच्छा लगूँगा? और इतनी इस्तताअत मुझमें नहीं कि मैं अपने सारे पड़ोसियों के मकान पक्के बनवा सकूँ, इसलिए मैं अपना मकान भी पक्का नहीं बनवाता, क्योंकि अपने पड़ोसियों के मुक़ाबले में अपनी कोई इम्तनाज़ी शान (अलग पहचान) बनाना मुझे अच्छा नहीं लगता।" ____📝📝📝____ किताब : माहनामा इल्म-ओ-अमल लाहौर (मई - 2025)। सफ़ा नंबर : 6. चयन : इस्लामिक ट्यूब प्रो ऐप।

सबसे हालिया

Naats