عربی ششم

خیر المفاتیح شرح اردو مشکوہ المصابیح 4
خیر المفاتیح شرح اردو مشکوہ المصابیح 4
خیر المفاتیح شرح اردو مشکوہ المصابیح 5
خیر المفاتیح شرح اردو مشکوہ المصابیح 5
خیر المفاتیح شرح اردو مشکوہ المصابیح 6
خیر المفاتیح شرح اردو مشکوہ المصابیح 6
لمعات التنقیح فی شرح مشکوۃ المصابیح  1
لمعات التنقیح فی شرح مشکوۃ المصابیح 1
لمعات التنقیح فی شرح مشکوۃ المصابیح  2
لمعات التنقیح فی شرح مشکوۃ المصابیح 2
لمعات التنقیح فی شرح مشکوۃ المصابیح  3
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لمعات التنقیح فی شرح مشکوۃ المصابیح  4
لمعات التنقیح فی شرح مشکوۃ المصابیح 4
لمعات التنقیح فی شرح مشکوۃ المصابیح  5
لمعات التنقیح فی شرح مشکوۃ المصابیح 5
لمعات التنقیح فی شرح مشکوۃ المصابیح  6
لمعات التنقیح فی شرح مشکوۃ المصابیح 6

दीवार पर पिता के हाथों के निशान।

दीवार पर पिता के हाथों के निशान।

अब्बा जी बूढ़े हो गए थे और चलते-चलते दीवार का सहारा लेते थे। नतीजतन दीवारों का रंग खराब होने लग गया, जहां भी वह छूते थे वहां दीवारों पर उनकी उंगलियों के निशान छप जाते थे। मेरी पत्नी को जब पता चला तो वह अक्सर गंदी दिखने वाली दीवारों के बारे में मुझसे शिकायत करती। एक दिन सर में दर्द हो रहा था तो अब्बा जी ने सर पर तेल की मालिश की। तो चलते हुए दीवारों पर तेल के दाग बन गए। यह देखकर मेरी पत्नी चीख उठी। और मैंने भी गुस्से में अपने वालिद (पिता) को डांट दिया और उनसे बदतमीजी से बात की, उन्हें मशविरा (सलाह) दिया कि चलते वक्त दीवारों को हाथ न लगाएं। वह बहुत गमगीन (उदास) नज़र आए। मुझे अपने रवैये पर शर्मिंदगी भी महसूस हुई मगर उनसे कुछ न कहा। अब्बा जी ने चलते हुए दीवार को पकड़ना छोड़ दिया। और एक दिन वह गिर पड़े और बिस्तर से जा लगे जो उनके लिए बिस्तर-ए-मर्ग (मृत्युशैया) बन गया और कुछ ही दिनों में वह हमसे रुख़सत हो गए (चल बसे)। मैंने अपने दिल में एहसास-ए-जुर्म (दोष की भावना) महसूस किया और मैं उनके उन तासुरात (भावों) को कभी भूल नहीं सकता था और इसके फ़ौरन बाद अपने आप को उनकी मौत के लिए माफ़ नहीं कर पाता हूँ। कुछ समय बाद, हम अपने घर को पेंट करवाना चाहते थे। जब पेंटर आए तो मेरा बेटा, जो अपने दादा से बहुत प्यार करता था, उसने पेंटरों को दादाजी की उंगलियों के निशान साफ़ करने और उन हिस्सों को पेंट करने की इजाज़त नहीं दी। पेंटर बहुत अच्छे और नए ख्यालात (جدت پسند) के थे। उन्होंने उसे यकीन दिलाया कि वे मेरे वालिद के फिंगरप्रिंट्स/हैंडप्रिंट्स को नहीं हटाएंगे, बल्कि उन निशानों के इर्द-गिर्द एक खूबसूरत दायरा (घेरा) बनाएंगे और एक अनोखा डिज़ाइन तैयार करेंगे। इसके बाद यह सिलसिला जारी रहा और वे प्रिंट्स हमारे घर का हिस्सा बन गए। हमारे घर आने वाले हर शख़्स ने हमारे इस अनोखे डिज़ाइन की तारीफ़ की। वक़्त के साथ-साथ मैं भी बूढ़ा होता गया। अब मुझे चलने के लिए दीवार के सहारे की ज़रूरत थी। एक दिन चलते हुए मुझे अपने वालिद से कहे हुए शब्द याद आए, और सहारे के बिना चलने की कोशिश की बात याद आई। मेरे बेटे ने यह देखा और फ़ौरन मेरे पास आया और चलते हुए मुझे दीवारों का सहारा लेने को कहा, इस डर का इज़हार करते हुए कि मैं सहारे के बिना गिर सकता हूँ। मैंने देखा कि मेरा बेटा मुझे थामे हुए है। मेरी पोती फ़ौरन आगे आई और प्यार से मेरा हाथ अपने कंधे पर रखकर सहारा दिया। मैं लगभग खामोशी से रोने लगा। अगर मैंने अपने वालिद के लिए भी यही किया होता तो वह ज़्यादा वक़्त तक सेहतमंद और खुश रहते। मेरी पोती मुझे साथ ले गई और सोफे पर बिठा दिया। फिर उसने मुझे दिखाने के लिए अपनी ड्रॉइंग बुक निकाली। उसकी टीचर ने उसकी ड्रॉइंग की तारीफ़ की थी और उसे बेहतरीन रिमार्क्स दिए थे। स्केच दीवारों पर मेरे वालिद के हाथ के निशान का था। उसके रिमार्क्स थे- "काश हर बच्चा बड़ों से इसी तरह प्यार करे।" मैं अपने कमरे में वापस आया और अपने वालिद से माफ़ी मांगते हुए रोने लगा, जो अब इस दुनिया में नहीं थे। हम भी वक़्त के साथ बूढ़े हो जाते हैं। आइए अपने बुज़ुर्गों का ख्याल रखें और अपने बच्चों को भी यही सिखाएं। अपने घर वालों को भी बताएं कि ये बुज़ुर्ग कीमती होते हैं, दीवारें और चीजें नहीं। (साभार / मनक़ूल)

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