عربی ہفتم دورہ حدیث شریف

فضل المنعم في شرح صحيح مسلم ٣
فضل المنعم في شرح صحيح مسلم ٣
فضل المنعم في شرح صحيح مسلم ٤
فضل المنعم في شرح صحيح مسلم ٤
فضل المنعم في شرح صحيح مسلم ٥
فضل المنعم في شرح صحيح مسلم ٥
فضل المنعم في شرح صحيح مسلم ٦
فضل المنعم في شرح صحيح مسلم ٦
زبدة الشمائل شرح شمائل ترمذی
زبدة الشمائل شرح شمائل ترمذی
صحاح ستہ اور ان کے مصنفین
صحاح ستہ اور ان کے مصنفین
الدر المنضود شرح سنن ابی داؤد جلد ١
الدر المنضود شرح سنن ابی داؤد جلد ١
الدر المنضود شرح سنن ابی داؤد جلد ٢
الدر المنضود شرح سنن ابی داؤد جلد ٢
الدر المنضود شرح سنن ابی داؤد جلد ٣
الدر المنضود شرح سنن ابی داؤد جلد ٣

एक मामूली वाक़या, एक अज़ीम (बड़ा) सबक़

एक मामूली वाक़या, एक अज़ीम (बड़ा) सबक़

लंदन में एक इमाम साहब रहते थे। रोज़ाना घर से मस्जिद जाने के लिए बस पर सवार होकर दूर मस्जिद तक जाना उनका नियम था। लंदन में तय समय और एक ही रूट पर बसों में सफर करते हुए कई बार ऐसा हुआ कि बस भी वही होती थी और बस का ड्राइवर भी वही होता था। एक बार ये इमाम साहब बस पर सवार हुए, ड्राइवर को किराया दिया और बाकी के पैसे लेकर एक सीट पर बैठ गए। ड्राइवर के दिए हुए बाकी के पैसे जेब में डालने से पहले जब उन्होंने देखे, तो पता चला कि बीस पेंस ज़्यादा आ गए हैं। पहले इमाम साहब ने सोचा कि यह 20 पेंस वह उतरते वक्त ड्राइवर को वापस कर देंगे क्योंकि यह उनका हक़ नहीं है। फिर एक ख़याल आया कि इतने थोड़े से पैसों की कौन परवाह करता है, ट्रांसपोर्ट कंपनी इन बसों की कमाई से लाखों पाउंड कमाती ही है, इन थोड़े से पैसों से उनकी कमाई में क्या फ़र्क पड़ेगा? मैं इन पैसों को अल्लाह की तरफ़ से इनाम समझकर जेब में डाल लेता हूँ और चुप रहता हूँ। इसी कशमकश में कि वापस करूँ या न करूँ, इमाम साहब का स्टॉप आ गया। बस जब इमाम साहब के निर्धारित स्टॉप पर रुकी, तो उन्होंने उतरने से पहले ड्राइवर को 20 पेंस वापस करते हुए कहा: "यह लीजिए बीस पेंस, लगता है आपने ग़लती से मुझे ज़्यादा दे दिए।" ड्राइवर ने 20 पेंस वापस लेते हुए मुस्कुराकर इमाम साहब से पूछा: "क्या आप इस इलाक़े की मस्जिद के नए इमाम हैं? मैं बहुत समय से आपकी मस्जिद में आकर इस्लाम के बारे में जानकारी लेना चाह रहा था। यह 20 पेंस मैंने जानबूझकर आपको ज़्यादा दिए थे ताकि इस मामूली रक़म के बारे में आपका रवैया परख सकूँ।" इमाम साहब जैसे ही बस से नीचे उतरे, उन्हें ऐसा लगा जैसे उनकी टांगों से जान निकल गई हो। गिरने से बचने के लिए उन्होंने बिजली के एक खंभे का सहारा लिया, आसमान की तरफ़ मुँह उठाकर रोते हुए दुआ की: "या अल्लाह मुझे माफ़ कर देना, मैं अभी इस्लाम को सिर्फ़ बीस पेंस में बेचने लगा था।" याद रखिए, कभी-कभी लोग सिर्फ़ क़ुरआन पढ़कर इस्लाम के बारे में जानते हैं, या ग़ैर-मुस्लिम हम मुसलमानों को देखकर इस्लाम की छवि (कल्पना) बनाते हैं। कोशिश करें कि कहीं कोई हमारे व्यक्तिगत और व्यक्तिगत व्यवहार को इस्लाम की तस्वीर और तमाम मुसलमानों का उदाहरण न बना ले। अगर हम किसी को मुसलमान नहीं बना सकते, तो कम से कम अपनी किसी हरकत की वजह से उसे इस्लाम से नफ़रत करने पर मजबूर न करें। हम मुसलमानों को ज़्यादा एहतियात (सावधानी) की ज़रूरत है क्योंकि सफ़ेद कपड़े पर लगा दाग़ दूर से ही नज़र आ जाता है। (मन्क़ूल — चयन: इस्लामिक ट्यूब प्रो ऐप)

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