عربی ہفتم دورہ حدیث شریف

بذل المجھود فی حل سنن ابی داود الجزء ٢
بذل المجھود فی حل سنن ابی داود الجزء ٢
بذل المجھود فی حل سنن ابی داود الجزء ٣
بذل المجھود فی حل سنن ابی داود الجزء ٣
بذل المجھود فی حل سنن ابی داود الجزء ٤
بذل المجھود فی حل سنن ابی داود الجزء ٤
بذل المجھود فی حل سنن ابی داود الجزء ٥
بذل المجھود فی حل سنن ابی داود الجزء ٥
بذل المجھود فی حل سنن ابی داود الجزء ٦
بذل المجھود فی حل سنن ابی داود الجزء ٦
بذل المجھود فی حل سنن ابی داود الجزء ٧
بذل المجھود فی حل سنن ابی داود الجزء ٧
بذل المجھود فی حل سنن ابی داود الجزء ٨
بذل المجھود فی حل سنن ابی داود الجزء ٨
بذل المجھود فی حل سنن ابی داود الجزء ٩
بذل المجھود فی حل سنن ابی داود الجزء ٩
بذل المجھود فی حل سنن ابی داود الجزء ١٠
بذل المجھود فی حل سنن ابی داود الجزء ١٠

बा-जमात नमाज़ की अहमियत और मुफ़्ती मुहम्मद शफ़ी साहब की आज्ञाकारिता

बा-जमात नमाज़ की अहमियत और मुफ़्ती मुहम्मद शफ़ी साहब की आज्ञाकारिता

मुझे याद है कि देवबंद में जब मेरी उम्र तक़रीबन दस-बारह साल थी, एक दिन फज्र की नमाज़ के वक़्त सख़्त आंधी, मूसलाधार बारिश और गरज-चमक की बिना पर (वजह से) वालिद साहब (मुफ़्ती मुहम्मद शफ़ी साहब) मस्जिद तशरीफ़ न ले जा सके और नमाज़ घर में ही अदा फ़रमाई। उधर दादा अब्बा, जो मस्जिद के आशिक़ और नमाज़ बा-जमात के शैदाई (प्रेमी) थे, इसी हालत में पांइचे (पायजामा) चढ़ाकर मस्जिद की जानिब रवाना हो गए, और वालिद माजिद को बारिश की वजह से उनके जाने का पता न चल सका। दादा अब्बा जब मस्जिद पहुंचे तो देखा कि ब-जुज़ (सिवाए) मोअज़्ज़िन के कोई दूसरा शख़्स मौजूद नहीं है। ख़ैर, मोअज़्ज़िन के साथ दो आदमियों की जमात हुई। और नमाज़ के बाद जब दादा अब्बा घर लौटने लगे तो सब मोहल्ले वालों को उनके घरों से उठा कर साथ लेते हुए सख़्त ग़ुस्से में घर पहुंचे। और वालिद साहब को बुलाकर सबके सामने इस क़दर डांटा कि वालिद साहब और सब मोहल्ले वाले दम ब-ख़ुद (हक्का-बक्का) रह गए। और फ़रमाया: "अफ़सोस है कि मुझे अपनी ज़िंदगी में ऐसा दिन देखना पड़ा, जिसकी मुझको तुम से तवक़्क़ो (उम्मीद) भी नहीं थी। आज अगर मैं न पहुंचता तो मस्जिद वीरान हो जाती और जमात न होती। मेरे बाद तो तुम इस मस्जिद को वीरान ही कर दोगे। मुझे अफ़सोस तो सब पर है, लेकिन सबसे ज़्यादा अपने इस बेटे पर है..." और भी न जाने क्या-क्या कहा? दादा अब्बा को दुनिया में वालिद साहब से बढ़कर कोई अज़ीज़ न था, मगर तुर्क-ए-जमात (जमात छोड़ने) पर इस क़दर गिरफ़्त (सख़्ती) फ़रमाई और तमाम मोहल्ले वालों और छोटी औलाद के सामने। फिर भी हज़रत वालिद साहब की इंतहाई सआदत-मंदी (आज्ञाकारिता) थी कि उन्होंने ज़रा भी नागवारी का इज़हार नहीं फ़रमाया, बल्कि नदामत और शर्मिंदगी का इज़हार करते हुए सबके सामने माफ़ी मांगी। बाद में फ़रमाया करते थे कि अगर उस दिन इतनी लताड़ न पड़ती तो उम्र भर एहसास न होता कि हमसे कोई ग़लती सरज़द हुई थी। (अल-बलाग़ मुफ़्ती-ए-आज़म नंबर, जिल्द 2, सफ़ा 1069) ___________📝📝___________ मनक़ूल (उद्धृत)। चयन: इस्लामिक ट्यूब प्रो ऐप

सबसे हालिया

Naats