عربی ہفتم دورہ حدیث شریف

احسان الباری لفہم البخاری
احسان الباری لفہم البخاری
فضل الباری فی درس البخاری جلد ۱
فضل الباری فی درس البخاری جلد ۱
فضل الباری فی درس البخاری جلد ۲
فضل الباری فی درس البخاری جلد ۲
فضل الباری فی درس البخاری جلد ۳
فضل الباری فی درس البخاری جلد ۳
فضل الباری فی درس البخاری جلد ۴
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درس شمائل ترمذی
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القول النقی فی شرح جامع الترمذی جلد ۱
القول النقی فی شرح جامع الترمذی جلد ۱
القول النقی فی شرح جامع الترمذی جلد ۲
القول النقی فی شرح جامع الترمذی جلد ۲
القول النقی فی شرح جامع الترمذی جلد ۳
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मुस्लिम उम्मत धर्मपरिवर्तन (इर्तिदाद) के कगार पर...!! (इर्तिदाद की तरफ ले जाने वाली एक नई साज़िश, अजीब खुलासा)

मुस्लिम उम्मत धर्मपरिवर्तन (इर्तिदाद) के कगार पर...!! (इर्तिदाद की तरफ ले जाने वाली एक नई साज़िश, अजीब खुलासा)

जब तक तबलीगी जमात में निकलना नहीं हुआ था, तब तक इस काम की कोई खास अहमियत नहीं थी। बस यह सुनते थे कि अल्लाह के रास्ते में निकलो, ईमान की अहमियत मालूम होगी, लोगों के हालात का अंदाज़ा होगा, उम्मत दीन से कितनी दूर है, लोगों को कलमा नहीं आता वगैरह-वगैरह। यह सब बातें सुनते तो थे, लेकिन एक कान से सुनते और दूसरे कान से निकाल देते थे। लेकिन जब यह मंज़र अपनी आँखों से देखा कि लोग इर्तिदाद (धर्मपरिवर्तन) के बिल्कुल करीब आ चुके हैं, तो एहसास हुआ कि वाकई अल्लाह ने हमें जिस माहौल में रखा है, उसका जितना भी शुक्र अदा किया जाए, कम है। हमारी जमात का 21 शव्वाल 1445 हिजरी को महाराष्ट्र के एक गाँव (साईखेड़ा, जिला बुलढाणा) जाना हुआ। वहाँ के हालात का जायज़ा लिया गया तो मालूम हुआ कि सिर्फ दो-चार घरों को छोड़कर पूरा गाँव ही मुसलमान है, लेकिन लोगों के नाम मुसलमानों वाले नहीं हैं। किसी का नाम सूरज है, तो कोई अर्जुन, तो कोई अपना परिचय राहुल के रूप में कराता है। जब इस बात की तहकीकात की गई (कि लोग मुसलमान होकर यह दूसरों वाले नाम क्यों रख रहे हैं), तो कोई भी इसकी सफ़ाई देने को तैयार न था। हर कोई बात को छुपाने की कोशिश कर रहा था। आखिरकार कई लोगों से बात करने पर पूरी बात सामने आई कि यहाँ आरएसएस (RSS) वालों का एक स्कूल है, जिसमें स्कॉलरशिप (Scholarship) के नाम पर साल में दस हज़ार रुपये दिए जाते हैं—पाँच हज़ार 15 अगस्त को और पाँच हज़ार 26 जनवरी को, और रोज़ाना दो वक्त का खाना भी दिया जाता है। लेकिन इस स्कूल में दाखिला (Admission) उसी शर्त पर दिया जाएगा जब अपना मुस्लिम नाम बदलकर हिंदू धर्म के मुताबिक नाम रखा जाए। इसका नतीजा यह हुआ कि पूरा गाँव मुसलमान होने के बावजूद सबके नाम हिंदू धर्म के मुताबिक हैं, यहाँ तक कि गाँव में कुछ उलेमा (धर्मगुरु) भी हैं जो इन नामों की लिस्ट में शामिल हैं। वहाँ के लोगों का कहना है कि इसमें ज़ाहिरा तौर पर क्या नुकसान है, बस नाम ही तो बदला है, जबकि इसमें एक नुकसान नहीं बल्कि कई नुकसानात हैं। सभी लोगों के नाम सरकारी रिकॉर्ड में इसी नाम से दर्ज हैं, जिसकी वजह से एक छात्र ने अपना एक वाकया (घटना) बताया कि "मैं एक मदरसे में दाखिला लेने गया तो मेरा दाखिला नहीं लिया गया, क्योंकि मेरे आधार कार्ड पर मेरा नाम 'सावन' था। मदरसे वालों ने यह समझा कि यह कोई जासूस न हो जो नाम बदलकर आया हो, या फिर इस डर की वजह से कि हिंदू नाम वाले को मदरसे में दाखिला देने से मदरसे को कोई परेशानी न उठानी पड़े।" दूसरा नुकसान यह कि अब वहाँ के लोगों का आम मामूल (नियम) बन गया है कि वे अपने बच्चों का नाम हिंदू धर्म के मुताबिक ही रखते हैं। हालांकि शायद ही कोई घर ऐसा हो जिसमें कोई चिल्ला (40 दिन) या चार महीने वाला न हो। इसके बावजूद कि अक्सर लोग जमात में अपना वक्त लगाए हुए हैं, लेकिन माहौल यह है कि शराब बिल्कुल आम है, हया (शर्म) का तो दूर-दूर तक कोई नामो-निशान नहीं, और लोग इस कदर गफ़लत (लापरवाही) में हैं कि किसी को भी उनकी इस खतरनाक साज़िश का अंदाज़ा नहीं। और बच्चों की तालीम (शिक्षा) का यह हाल है कि पूरे गाँव में दो ही मकतब चलते हैं, वे भी अव्यवस्थित (गैर-मुरत्तब), जिनमें से एक मकतब कई महीनों से बंद है। हालांकि मकतब ही वह ज़रिया है जिससे बच्चों के ईमान और अक़ायदे की हिफाज़त हो सकती है। अब अगर इस पर भी ध्यान न दिया जाए, तो हालात बद से बदतर हो जाएंगे। और सबसे बड़ा नुकसान, जिसका किसी को ख्याल नहीं, यह समझ आ रहा है कि उनकी यह मेहनत पचास-साठ साल पहले की है। अब जब कुछ नस्लें (पीढ़ियाँ) गुज़र जाएंगी, तो ये फिर आएंगे और सबूत (प्रूफ) के साथ आएंगे। और लोगों के घर-घर जाकर यह बात बोलेंगे कि "तुम मुसलमान हो ही नहीं, हमारे पास प्रूफ है! देखो, तुम्हारा नाम अर्जुन है, तुम्हारा बाप का नाम राहुल है, तुम्हारे दादा का नाम जीवन था, तुम्हारे परदादा का नाम सूरज था, तो तुम कैसे मुसलमान हो गए?" यह उनकी मेहनत का असल नतीजा है। और इसकी इब्तिदा (शुरुआत) भी हो चुकी है कि अपनी आँखों से कुछ घरों में मूर्तियाँ भी देखीं, लेकिन वहाँ के लोगों का कहना है कि वे असल में मुसलमान नहीं हैं। हालांकि यह बात मशहूर है कि सिर्फ तीन-चार घर ही गैर-मुस्लिमों के हैं और यह घर उन तीन-चार घरों में नहीं आता। (वल्लाहू आलम बिस्सावाब - अल्लाह ही बेहतर जानता है)। अब ज़रूरत इस बात की है कि इन लोगों के लिए खूब दुआएँ की जाएं और ज़मीनी तौर पर यह मेहनत की जाए कि वहाँ कोई मज़बूत जमात भेजी जाए जो इस गाँव के हालात को बदलने की कोशिश करे, वरना वह दिन दूर नहीं जब लोग ईमान से हाथ धो बैठेंगे। (अल्लाहुम्मा अहफ़िज़ना - ऐ अल्लाह, हमारी हिफाज़त फरमा)। (منقول و ماخوذ - साभार नकल) इंतखाब (चयन): इस्लामिक ट्यूब प्रो ऐप। लेखक: इमरान इब्न मुहम्मद मूसा बनारसी।

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